फ्लैट की चाबी मांगना, मेट्रीमोनियल वेबसाइट पर लड़कियां देखना, प्रोमोशन के लिए बॉस के आगे-पीछे घूमना, ट्रेन-बस में किसी अंजाने से मुलाकात और फिर दोस्ती हो जाना। यह सब कुछ हर रोज आजकल भारत के कोस्मोपोलिटन शहरों में हो रहा है। यह हमारे बदलते समाज की कहानी है। अंग्रेजी में इसे ट्रांजिशन फेज कहते हैं।
मुझे मुंबई के बारे में बहुत आइडिया नहीं है लेकिन जो लोग दिल्ली के नार्थ कैंपस इलाके की जीवन शैली को जानते हैं उन्हें कम से कम अनुमान होगा कि ऐसा सचमुच में होता है। रात को देर रात तक पार्क में घूमना। देर रात तक किसी दूसरे के कमरे का उपयोग करना।
अनुराग बसु का निर्देशन और प्रीतम का संगीत बेहतरीन है। सभी किरदारों ने अपने किरदार के साथ पूरी ईमानदारी बरती है। इरफान खान और कोंकणा सेन ने बेहतरीन काम किया है। शरमन जोशी में थोड़ी परिपक्वता दिखी है। धमेंद्र और नफीसा अली की जोड़ी अच्छी थी।
ओवरसीज में शिल्पा शेट्टी के नाम पर फिल्म जरूर चल रही है। भावनाओं के ताने-बाने पर बुनी और भारत के बड़े शहरों की जिंदगी को चित्रित करती फिल्म मेट्रो अच्छी बनी है।
कल बड़े दिनों बाद मैं थिटेटर में जाकर फिल्म देख पाया।
May 25, 2007 at 2:37 pm |
sach kahoon to bahut dino baad kisi hindi film ko dekhne me mujhe maja aaya.
June 6, 2007 at 7:36 am |
[...] दोविश्लेषणमुझे दाल भात खाने दीजिये..Life in a METRO, दौड़ते-भागते शहर की कहानीलोगों का पथ और यात्रा अवरुध्द करना [...]