कल तक सचिन को लोग सचिन के नाम से ही जानते थे। उसका कोई पुकारू नाम भी नहीं था। आज सचिन स्वयं लोगों को अपना ‘जॉन केली’ बताता है। सचिन गुड़गांव के एक काल सेंटर में काम करता है। उम्र 21 साल। पिता ‘म्यूनिसिपल कोरपोरेशन आफ दिल्ली’ (एमसीडी) में काम करते हैं। जितनी सैलरी पिता को मिलती है उससे 3 हजार ज्यादा सचिन कमाता है। उनके पिता पूर्वी उत्तर प्रदेश के मऊ जिले से हैं। सचिन का जन्म दिल्ली में ही हुआ है।
(यह एक प्लाट है। जो मैं रोज देखता हूं। मैंने सोचा कि कुछ लिखूं और आज लिख रहा हूं। सारे किरदार काल्पनिक हैं)
आज के नैसर्गिक गुणों वाले हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 1993 में जो बजट पेश किया उसका प्रभाव आज पित्जा हट, न्यूमरो यूनो, मैक डोनाल्ड, कैंटा बिल व अन्य ब्राडों के रूप में हमारे सामने है।
सचिन को पित्जा हट का पित्जा नहीं पसंद है। उसे जब भी पित्जा खाने की इच्छा होती है वह डोमिनोज से पित्जा को आर्डर देता है। शौक से वह कुर्ता पहनता है लेकिन ब्रांडेड। साथ में लिवाइस का डेनिम। लोगों से मिलने पर हाई और जाने पर सि या कहता है।
यह सब चीजें उसने ना तो स्कूल-कालेज में सीखी हैं और ना ही घर में। जिस कंपनी में वह काम करता है वहां का माहौल उसे यह सब सिखा रहा है।
भारत में 25 से 35 साल के उम्र की आबादी का हिस्सा 53 फीसदी है। इसका मतलब की आधी से ज्यादा जनसंख्या युवा है।
अब सचिन डेटिंग के लिए जाता है। लेकिन छुप-छुप कर। आज भी भारत में प्यार को सार्वजनिक रूप में कहने से लोग हिचकते हैं। वीकेंड कल्चर ने लोगों के मस्ती करने का ढंग बदला है। पहले लोग घर में कैरम बोर्ड और सांप-सीढ़ी खेलते हैं और आज कोंट्रा-मारियो के एडवांस्ड वर्जन बाजार में मौजूद हैं। फिर हर दस किलोमीटर में एक मल्टीप्लेक्स।
पूजा के नाम पर महिलाएं अपने घरों में बने मंदिर में पूजा करतीं हैं। या फिर अपनी सैंट्रो कार और लकदक साड़ी में सजकर मंगलवार शाम को अक्षरधाम मंदिर में जाती है।
इस ग्लोबलाइजेशन ना जाने कितने डे (दिवस) बना दिए। इसका श्रेय जितना यश चोपड़ा को जाता है उतना ही प्रधानमंत्री को भी जो कभी वित्त मंत्री थे।
शशि कपूर का एक फेमस डायलग है। ‘मेरे पास मां है।’ तो पहले मदर्स डे आया है। लेकिन अब फादर्स डे भी कतार में खड़ा है। रोज डे, वैलेंटाइंस डे ने ग्लोबलाइजेशन में बजरंग दल, विश्व हिन्दू परिषद और शिव सेना को भी लाइम लाइट में ला दिया। हमारे देश में खजुराहो और अजंता-एलोरा बहुत पहले से हैं। इस पर यह शान बघारते हैं और वैलेंटाइंस डे पर डंडा।
किसी ने कहा है कि जहां भी संस्कृति का क्षरण हो रहा हो तो समझो कि वहां विकास आने वाला है। भारत भी विकसित राष्ट्र बनने वाला है।
इस लेख से कोई भी असहमत हो सकता है। असहमत होने वालों से दो बातें कहूंगा। पहला कि आप कभी गुड़गांव और नोएडा के इन कॉल सेंटरों के चक्कर लगाएं दूसरा कि अगर आप वहीं काम करते हैं और असहमत हैं तो Exception is Everywhere