कल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाएगा। हम सभी लोगों ने डिस्कवरी चैनल पर पर्यावरण से ना छेड़छाड़ करने के कई तरीके देखे होंगे। लेकिन अमल हम लोगों में से कुछ ने ही किया होगा।
कल दिल्ली में पारा था 44 डिग्री और पुरुलिया में 48डिग्री। किसी ने आफिस में कहा कि हे भगवान इतनी गर्मी मत बढ़ाओ। क्या इसके लिए भगवान जिम्मेदार हैं?
बीते कुछ सालों से एक समस्या ग्लोबल समस्या बन गई है। इसका नाम ही ग्लोबल वार्मिग है। क्योटो में इसे सुलझाने की बात चल रही थी लेकिन यह सुलझी नहीं। बेशक यह और विकराल हो चली है।
इस माल, पित्जा-बर्गर, अपार्टमेंट संस्कृति ने पर्यावरण को घर में लगे मनी प्लांट तक सीमित कर दिया है। लोग अपने लॉन में मिर्च के दो पौधे लगाकर बहुत खुश होते हैं। हमें इनसे आगे सोचना होगा।
इस बार जो पर्यावरण दिवस पर स्लोगन दिया गया है, वह है Melthing Ice, A Hot Topic। हमें ऐसे प्रयास करने होंगे कि आइस मेल्ट ना करने पाए।
June 4, 2007 at 12:51 pm |
भाई इसके लिये चिंता ही व्यक्त की जाती है सारे प्रयाश धरे के धरे रह जा रहे है, सभी का सोच है हमारे रहते कुछ ना हो आगे का कौन सोचता है, यही विचार ईसका सबसे बढा कारण है
June 4, 2007 at 12:55 pm |
सही कहते हैं कि Nature loves symmetry. अब आदमी इस सिमिट्री को बिगाड़ेगा तो उसे सही करने के लिए प्रकृति अपना ही तरीका अपनाएगी।
June 4, 2007 at 3:29 pm |
सभी को मिल कर अपने हिस्से के छोटे छोटे योगदान करने होंगे. अभी पिछली भारत यात्रा के दौरान एक संस्था के द्वारा लोगों के जन्म दिवस पर उन्हें बुला कर एक पेड़ लगाने का कार्य किसी स्कूल के प्रांगण में बड़ा सराहनीय लगा.
June 5, 2007 at 2:14 am |
प्रयास तो किये ही जा सकते है ।
June 5, 2007 at 3:01 am |
पर्यावरण की हिफाजत पर हम सब भाषण बहुत देते हैं । पर थैली लेकर बाज़ार जाने में हमें तकलीफ होती है, पॉलीथीन जो है । थोड़ी थोड़ी दूरी पर जाने के लिए गाड़ी निकाल लेते हैं, पैदल जाते पसीने जो आते हैं, कार पूल का इस्तेमाल हेठी लगती है, अपनी कार की नुमाईश जो लगानी है, दफ्तर और घर के पंखे और लाईटें खुली छोड़ देते हैं । इसी तरह की कई बातें हैं जो ऊर्जा के संरक्षण और पर्यावरण की हिफाजत से जुडी हैं पर हम इन पर ध्यान नहीं देते ।
June 5, 2007 at 4:55 pm |
भैया, हम भारतीय हर पर्यावरण दिवस पे बातें बड़ी बड़ी करते है लेकिन बाद में फ़िर वही ढाक के तीन पात।
क्यों हम सिर्फ़ पर्यावरण दिवस पर ही पर्यावरण सुरक्षा की बात करते हैं।
साल भर पहले अपने मकान के सामने मैनें दो पौधे(वृक्ष लगाने की सोचा, फ़टाक से सोसायटी से आब्जेक्शन आ गया कि नहीं वहां पर नीचे से पानी की पाईप लाईन गई है अत: नहीं लगा सकते, खैर मैनें दिमाग लगाया और बड़े वृक्ष ना लगा कर शो वाले पेड़ लगा दिए। कम से कम हरियाली तो दिखेगी सूनी सड़क पर।
क्यों न हर व्यक्ति के लिए दो वृक्ष लगाने अनिवार्य कर दिएं जाएं।
June 6, 2007 at 6:51 am |
पर्यावरण के प्रति आपके विचार सराहनीय हैं। कुछ विशेष उपाय यहाँ सुझायें गए हैं।
“पिघलती बर्फ” के साथ “गिरते ओले” भी ग्लोबल वार्मिंग का ही प्रकोप है। भारत के पूर्व तट के कई स्थानों में रोजाना दोहपहर तक तेज गर्मी पड़ती है, तीसरे प्रहर आँधी-तूफान-चक्रवात, कई पेड़ों और बिजली के खम्भों का उखड़ना और चौथे प्रहर वर्षा में बड़े बड़े ओले गिरना, पेड़-पौधों, पत्तों का भारी नुकसान, दूसरे दिन और तेज गर्मी… आम बात हो गई है।