नारद, राहुल, संजय और लोकतंत्र

मेरा पूरा पोस्ट नारद पर हुए विवाद और यहां दिए जा रहे टिप्पणियों पर केंद्रित है। नारद पर हुए एक पोल के अनुसार मेरी उम्र इस पोल में भाग लेने वाले सबसे ज्यादा 47 फीसदी में आता है। लेकिन फिर भी मैं अपनी आयु को अल्प ही मानता हूं। इस अल्प आयु में मैंने जो कुछ भी सीखा समझा है उसके बारे में यही कह सकता हूं कि जब आप किसी दूसरे के बारे में कह रहे होते हैं तो उस शख्स से ज्यादा आप अपना परिचय दे रहे होते हैं।

जी हां, आपके द्वारा दूसरे के बारे में दी गई टिप्पणी या पोस्ट यह बताती है कि आप कैसे हैं। यह मेरा नितांत अपना मानना है। आप इसे मान भी सकते हैं और नहीं भी। क्योंकि हम लोकतंत्र में रहते हैं और मुझे लोकतंत्र शासन के अन्य सभी रूपों से सवरेत्तम लगता है।

पहले राहुल जी  के बाजार की बात ye mere comment the मुझे नही पता याहा लोग क्या चाहते हैं? ब्लोग लिखना या अपनी इदेंतित्य क्रिसिस कि भूख को मिटाना । मौका मिला तो एक पोस्ट इसपर भी लिखना होगा । समीर जी, रचना जी, कमल जी, फिलिप जी, पुराणिक जी, घुघूती जी और भी कई लोग हैं क्या इनलोगों को किसी विवाद में पड़ते देखा है। लेकिन मैं पुरे यकीं से कह सकता हु कि ये सभी लोग कई अन्य जो विवाद फ़ैलाने वाले लोगो से पोपुलर हैं । हिट्स पाने के कई अन्य तरीके होते हैं जिसमे ये तरीका बड़ा घटिया है। कुछ तो बदलाव जरूरी है। लगता है कि इस पर जुल्य में हो रही मीटिंग में बात करनी होगी ।
धन्यवाद
राजेश रोशन

और अब नारद क्या नारद लोकतंत्र की तरह काम करता है? मुझे नहीं लगता। किसी ने एक फीड एग्रीगेगटर बनाया और लोगों के बीच पोपुलर हो गया। यहां तक सब कुछ अच्छा रहा लेकिन फिर बारी आई दायित्व की। उसमें शायद नारद से थोड़ी चूक हो गई। नारद कई सारे काम कर सकता था। मसलन नारद उवाच द्वारा एक पोस्ट लिख कर सभी से टिप्पणियां ले लेता। जैसा कि नारद को लग रहा है कि कई लोग उसके पक्ष में हैं वो टिप्पणी द्वारा उसका समर्थन कर देते। फिर उसके बाद ब्लाग हटाना, पोस्ट हटाने का निर्णय लिया जा सकता था। लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ। (विकीपीडिया में ऐसा होता है)।

संजय जी गुजरात के लोग तो बड़े मीठे होते हैं आप कैसे इतना कड़वा बोल लेते हैं। आप नामवर सिंह को भला-बुरा कहें कोई बात नहीं लेकिन आपको कोई कह दे तो फिर बुरा कैसा। थोड़ा संयम तो रखा ही जा सकता है। विवाद से बचें।

मैंने आज श्रीश जी के पोस्ट का शीर्षक देखा लिखा था, नारद द्वारा चिट्ठा हटाने का निर्णय एकदम सही था। मैं इस शीर्षक से ‘एकदम’ को हटाना चाहता हूं।

मेरी सभी ब्लागरों से निवेदन है कि थोड़ा संयम रहें और क्रियाशील लेख लिखें। इस पोस्ट से अगर किसी को भी बुरा लगा हो तो उसके लिए मैं क्षमा चाहता हूं।

4 Responses to “नारद, राहुल, संजय और लोकतंत्र”

  1. संजय बेंगाणी Says:

    मैने नामवरजी को क्या भला-बुरा कहा? कहाँ कहा?

    और जिस बात को लेकर बखेड़ा हुआ, पहले जाकर देखें एक लेखक के साथ गंदा मजाक तो उस ब्लोगर ने किया था. मैने तो केवल उसका विरोध किया था.

    सरदार पटेल भी गुजरात के थे. वे मीठा बोलने जाते तो आज 356 भारत होते.

  2. Amit Says:

    सरदार पटेल भी गुजरात के थे. वे मीठा बोलने जाते तो आज 356 भारत होते.

    356 नहीं 675 ;)

  3. अनूप शुक्ल Says:

    सही है! बुरा नहीं लिखा है! :)

  4. श्रीश शर्मा Says:

    नारद कई सारे काम कर सकता था। मसलन नारद उवाच द्वारा एक पोस्ट लिख कर सभी से टिप्पणियां ले लेता। जैसा कि नारद को लग रहा है कि कई लोग उसके पक्ष में हैं वो टिप्पणी द्वारा उसका समर्थन कर देते। फिर उसके बाद ब्लाग हटाना, पोस्ट हटाने का निर्णय लिया जा सकता था।

    नारद उवाच पर बहुसंख्यक चिट्ठाकारों द्वारा नारद के फैसले का समर्थन करने से क्या यह साबित नहीं हो जाता कि यह फैसला लोकतांत्रिक है?

    मैंने आज श्रीश जी के पोस्ट का शीर्षक देखा लिखा था, नारद द्वारा चिट्ठा हटाने का निर्णय एकदम सही था। मैं इस शीर्षक से ‘एकदम’ को हटाना चाहता हूं।

    ठीक है जी बिना ‘एकदम’ के पढ़ लीजिए। :)

    आपने अपने विचार ईमानदारी से व्यक्त किए, बधाई!

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