कमेंट डालने पर ताला मत लगाईए
लोगों को इसके बारे में पता तो होगा ही। अभी-अभी मैंने किसी पोस्ट पर कमेंट दिया और वो कहता है कि बाद अप्रूवल मिलने के बाद कमेंट को अपलोड किया जाएगा। क्यों?? कुछ समझ नहीं आया।
लोग अपने घर में ताला लगा कर रखते हैं कि कोई गलत आदमी प्रवेश ना करे। कुछ चुरा के कोई ना ले जाए। आप कहीं गालियों से डर कर तो यह मोडरेशन नहीं लगा रखा है? अगर हां तो एक बात बता दूं, आप सभी लोगों को कि आप जब किसी के बारे में कुछ बोलते हैं तो आप उस शख्स से कहीं ज्यादा अपने बारे में बता रहें होते हैं कि आप कौन और क्या हैं।
इसलिए डरना छोड़िए आटो अप्रूवल को ऑन कर दीजिए। अगर किसी को तकनीकी परेशानी हो तो श्रीश जी आपकी मदद के लिए हमेशा तैयार हैं। यह मैंने उनसे बिना पूछे लिखा है क्योंकि मुझे उनके बारे में जो पता है वह यह बताती है कि श्रीश जी चिट्ठेकारों के मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।
July 22, 2007 at 11:53 am
इस अप्रूवल की सुविधा का गालियों से बचने के अलावा एक फ़ायदा और है प्यारे.. कल अनूप जी मेरे चिट्ठे की चार पोस्टों पर एक साथ प्रतिक्रिया दे गए.. ज़ाहिर हैं तीन पुरानी थीं.. अब अगर अप्रूवल ऑन न होता तो हमें कैसे पता लगता अनूप जी के अनुग्रह का.. ? तो अप्रूवल को ताला नहीं घंटी समझो..
July 22, 2007 at 12:28 pm
अभय जी आप मेरे ब्लोग में तीन महिने पुराने पोस्ट में कमेंट करेंगे तो भी मुझे पता चल जाएगा । comment on mail service. इस on कर लीजिये ना तो ताले कि जरुरत पडेगी ना ही घंटी की।
July 22, 2007 at 12:51 pm
July 22, 2007 at 1:46 pm
यदि कोई टिप्पणी खराब है या गालीमय शब्दों के साथ है तो हटा भी सकते हैं.
July 22, 2007 at 3:07 pm
सही कहा. ताला लगाने की ज़रूरत क़तई नहीं है. अवांछित कमेंट अपने आप किनारे किए जा सकते हैं. बीस के बीच में एकाध कमेंट अश्लील या अवांछित आ गया तो घबराने की बात क्या है…
July 22, 2007 at 3:51 pm
100 प्रतिशत सहमत. तालेबाजी में बेवजह समय जाया होता है. और पढ़कर उत्साह में टीपने पहुंचे तो इतने बैरियर की मन बोर हो जाए.
वैसे जिनको भी टीपने में अन्य कहीं असुविधा हो हमारे ब्लाग के द्वार खुले हैं. पढ़िये सबको टीपिये हमारे यहां.
अच्छा विषय उठाया रोशन भाई ने.
July 22, 2007 at 4:11 pm
भई हम ही अंधकार में थे.. आप के ज्ञान की रौशनी में कुछ सीखा.. गलती सुधार ली है.. आप आ कर बेधड़क टिपिया लें..अब कोई ताला नहीं है.. मगर कोई गलियाने वाले आ गया तो हो सकता है कि हम वापस ताले की सुरक्षा में दुबक जायं..
July 22, 2007 at 5:11 pm
अरे मेरे हिसाब से तो यह ताला बहुत जरुरी है। हालांकि वर्डप्रैस पर प्रायः ताला पूरी तरह से नहीं होता। ज्यादातर समय टिप्पणी अप्रूव हो जाती है। काफी बार स्पैम फ्लिटर में फंस कर अप्रूवल की जरुरत पड़ती है। वैसे भी ताले कभी शरीफ लोगों के लिए नहीं लगाए जाते हमेंशा चोरों बदमाशों के लिए ही लगते हैं। इंटरनेट पर बहुत से लोग स्पैम करने के लिए नए नए तरीके इजाद करते रहते हैं जिनमें से एक है चिट्ठों पर कमेंट में वियाग्रा, सेफलिस इत्यादि बेचने के लिए कमेंट छोड़ना। ये काम कमेंटबोट्स जैसे स्क्रिप्ट करते हैं यानि कि स्पैमर के प्रोग्राम जगह जगह जाकर देखते हैं कि कमेंट हो सकते है कि नहीं जैसे ही मौका मिला कमेंट छोड़ दिया। बताईए क्या आप अपने कमेंट ऐसे देखने पसंद करेंगे
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July 22, 2007 at 5:47 pm
हमारे यहाँ ताला खुला है फिर आने में कैसा शरमाना. कम ही दिखते हो?
July 22, 2007 at 9:42 pm
खुलापन ही तो ब्लाग की खूबसूरती है । इसे ब्लाग ही रहने दीजिए, अखबार मत बनाइए । अखबारों के सम्पादकों से मुक्ति का उपाय, ले-दे कर यह ब्लाग ही तो है । ‘जीरो डिफेक्ट सिस्टम’ कोई नहीं होता । गालियों से डरिये मत । जो आपको जानते हैं, उनकी चिन्ता मत कीजिए, आप कुछ भी कर लें, वे आपके बारे मे अपनी राय नहीं बदलेंगे । और जो आपको नहीं जानते, उनकी चिन्ता क्या करना ? सो, बिन्दास रहो । जो जैसा बायेगा, वैसा ही काटेगा ।
July 23, 2007 at 1:36 am
बात प्रतिबंध की नहीं है, न खुलेपन से विरोध की है। अपने खिलाफ़ गालियां भी कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन कमेंट माडरेशन इसलिये जरूरी है ताकि लोग आपके ब्लाग पर अवांछित कमेंट न कर सकें। दूसरे के खिलाफ़ अपने ब्लाग में अशोभनीय टिप्पणी बचाना आपका कर्तव्य है। कुछ टिप्पणियां ऐसी होती हैं कि उनको भले ही बाद में आप मिटा दें लेकिन तब तक वो अपना काम कर चुकी होती हैं। मिर्ची सेठ की स्पैम वाली बात ध्यान रखने योग्य है।
July 23, 2007 at 2:42 am
मिर्ची सेठ सही कह रहें हैं। मेरे विचार से जरूरी है।
July 23, 2007 at 2:47 am
मिर्ची सेठ जी की बात मे दम है !
July 23, 2007 at 4:46 am
भाई मेरा चिट्ठा वियाग्रा की दुकान बन जाये अगर मोडरेशन न रखों तो. हाँ जिसे एक बार मोडरेट कर दिया जाता उसकी टिप्पणी फिर हमेंशा तुरंत दिखती है.
July 23, 2007 at 7:57 am
देखिये मैं अपनी स्मृति का रोना ऐसे ही नहीं रोता हूँ.. अनूप जी के कमेंट से याद आया.. ये ताला मैंने तब लगाया था जब किसी एक बेनाम ने मेरे ब्लॉग पर मसिजीवी के खिलाफ़ कुछ उल्टा सीधा लिखा था.. तब आप ही जैसे किसी तकनीकी जानकार(कौन? फिर स्मृति..) ने इस ताले के बारे में ज्ञान दिया..
अब अनूप जी की बात फिर सही लग रही है.. क्या करूँ.. फिर लगा दूँ ताला..?