अगर आपने आट्र्स की पढ़ाई की होगी या कर रहें होंगे तो आप भी आईएएस की तैयारी के बारे में सोचते होंगे। आपका जवाब नहीं है! मुझे सहज रूप से विश्वास नहीं हो रहा। मैं आपसे कहूंगा कि ईमानदारी से जवाब दें। हम भारतीय किसी बात का जवाब थोड़ा कम ईमानदारी से देते हैं।
और अगर आप इतिहास के विद्यार्थी रहे होंगे तो आप..।
मैं बुधवार को मुखर्जी नगर गया था। आईएएस का मक्का कहूं तो शायद कुछ गलत नहीं होगा। इसके दो-तीन किलोमीटर के एरिया में आट्रम लाईन, हकीकत नगर, परमानंद, नेहरू विहार, ढका गांव व अन्य कुछ छोटे जगह शामिल है।
छोटे-छोटे दर्जनों संस्थान से घिरा बत्तरा सिनेमा यहां के होनहारों के लिए शाम को चाय की चुस्की लेने का सबसे पसंदीदा स्पाट है। दो रुपये की चाय, ढाई रुपये की सिगरेट और तीस मिनट दोस्तों से बातचीत। यह शाम का माहौल है।
जागृति, लक्ष्य, दृष्टि, श्योर शाट, क्षितिज, केंद्र और ना जाने ऐसे ही कई प्रेरित करने वाले शब्दों से भरा है। यहां का पूरा आर्थिक बाजार इन विद्याथियों के सहारे ही चलता है। अक्टूबर में यहां मंदी आ जाती है। मेंस के बाद बहुत सारे विद्यार्थी अपने घर चले जाते हैं।
इन सबके साथ यहां के कुछ पार्को में आप उन जोड़ों को देख सकते हैं, जो पढ़ाई के साथ प्यार की पींगे भी बढ़ाते हैं। मेरे लिए वो भी वुड बी आईएएस की तरह हैं। कौन जाने प्यार की तरह वह अपने पढ़ाई पर भी पूरा केंद्रित कर लेते हों।
मेरे एक दोस्त ने बताया कि आज-कल में उनका प्री का रिजल्ट आने वाला है। उन सभी विद्यार्थियों को जिन्होंने आईएएस बनने को अपना सपना चुना है, उन्हें सलाम। क्योंकि मैं उतना हिम्मतवाला कभी नहीं बन सका।
Mukharjee Nagar in Wikimapia
July 29, 2007 at 7:27 am |
सलाम उन्हें अपना भी!! सही कह रहे हैं आप, यह सपना चु्नने और उस रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए हिम्मत और हिम्मत से ज्यादा एक ज़िद चाहिए !!
July 29, 2007 at 8:45 am |
थोड़ा और विस्तार दें, इस विषय में बहुत संभावनाएं हैं- रवीश ने भी कुछ कुछ कहना श्रुरू किया है इस बारे में।
July 29, 2007 at 9:35 am |
अपना भी बोरिया-बिस्तरा लगा था साल भर के लिए यहां… हर साल 25-50 की कामयाबी किस्से बनते है यहां। जिसके बुते लाखों का बाजार कायम है। मगर नाकामी के हजारों अफसाने भी है यहां। जिनकी चर्चा अपने गांव या कस्बे में न हो जाये इस जुगत में दिलवाली(पत्थरदिल) दिल्ली की ठोकरे खाते फिरते है। इनमें से कुछ की निकल पड़ी पत्रकार हो गये या फिर काला कोट मिल गया। … और बाकियों का ? अब भी दो यार।
July 29, 2007 at 9:44 am |
सही है जैसा लोग कह रहे हैं विस्तार करें इसका!
July 30, 2007 at 7:28 am |
मैं मुखर्जी नगर से लौटा तो लिख दिया । अब आप लोगो के आग्रह पर मैं इसे बढ़ाने कि पूर्ण कोशिश करुंगा