शाम का समय। सरकार के एसबीआई बैंक से लेकर के वी कामथ के आईसीआईसीआई बैंक के एटीएम में कतारबद्ध लड़के-लड़कियां। आलू, चावल, दाल के लिए पैसे निकालते हुए।
आज के आईएएस की तैयारी करने वाले छात्र मितव्ययी तो एकदम नहीं होते। सिगरेट और चाय में इनके सबसे ज्यादा पैसे खर्च होते हैं।
दिल्ली आने के बाद इनको जो सबसे ज्यादा दिक्कत होती है वह है एड्रेस प्रूव की। इनका कोई निश्चित ठिकाना तो होता नहीं है। आज यहां हैं तो कल कहीं और। वैसे एड्रेस प्रूव की जरूरत इन्हें दो मौकों पर ज्यादा होती है। सिम कार्ड या फिर बैंक खाता खुलवाने के वक्त। वैसे यह दिक्कत हर शहर में हर नए शख्स को होती है।
इन होनहारों की एक और खास बात होती है यह सफाई खुद से नहीं करते हैं। इन्हें 300 रुपये प्रतिमाह में कूक और 50 रुपये प्रतिमाह में कूड़ा उठाने वाला/वाली बड़े आसानी से मिल जाती है। दिल्ली में सकरुलेशन को लेकर लड़ने वाले दो बड़े अखबार इनकी पसंद नहीं होते। इनके ‘द हिंदू’ आता है। वह अलग की बात है कि उसे भी यह पढ़ते कम ही हैं। प्रतियोगिता दर्पण यहां की हाट मैगजीन है।
अगर इन इलाकों में सबसे ज्यादा कोई परेशान है तो वह हैं मकान मालिक। इनका दर्द कोई नहीं सुनता। कम से कम यह छात्र तो एकदम नहीं। 100 में से 70 मकानों में छात्र की जमघट लगी ही रहती है। आप किसी परिचित छात्र के यहां जाने पर आपका दोस्त कम से कम अपने पांच दोस्तों से आपका परिचय कराता है।
इनकी बातें एक आम जागरूक इंसान के लिए हमेशा मजेदार होतीं हैं। इतिहास के गर्भ से कभी भी आपको ये कोई हीरा तो कभी कोई पत्थर के बारे में बता सकते हैं। हिंदी की बात चलेगी तो बीच-बीच में अज्ञेय, नागाजरुन, प्रेमचंद, दिनकर, महादेवी की पंक्तियां आपको लुभाएंगी। इनके पास बताने को बहुत कुछ होता है। समाज के जोड़-तोड़ के बारे में, इसकी संरचना, जातिगत व्यव्स्था के बारे में समाजशास्त्र वैकल्पिक विषय रखने वाला छात्र आपको बहुत कुछ बता जाएगा।
और भी बहुत कुछ..बाद में
July 30, 2007 at 9:08 am |
मित्र,
इन्ही पथों से होकर गुजरा हूँ, इसलिये आपकी बात की पूरी तरह से तस्दीक करता हूँ ! हाँ यह बात और है कि सरकार की सेवा में आने के बाद अनुभव अब यादें बन गये हैं
July 30, 2007 at 9:37 am |
गहरी संवेदना मन के भीतर पैदा कर दी…भाई…
मेरे लिए तो यह जगह गाँव की तरह प्यारा है आज भी, अपने जीवन का का 16 साल यहीं बिताया है मैंने… एक-2 दूकान कोचिंग क्लासेस वो रास्ते बत्रा सिनेमा… आदि-2 क्या लेकर आये दोस्त कि मन तड़प उठा…
July 30, 2007 at 1:47 pm |
इनका कितना प्रतिशत हिस्सा वाकई आई ए एस में कनवर्ट होता है यह जानने योग्य है, तभी इन गतिविधियों की सार्थकता का आभास लगाया जा सकता है अन्यथा तो मात्र एक चित्र है.
July 30, 2007 at 9:14 pm |
Its one of the most happening place to live
July 31, 2007 at 12:32 am |
अच्छा लग रहा है आपके ये अनुभव पढ़ना!
July 31, 2007 at 1:22 am |
[...] आईएएस और आईएएस का मक्का मुखर्जी नगर-2 दिल्ली में संघर्षरत युवा पर अपने शब्द चित्र की दूसरी किश्त लेकर आये हैं राजेश रौशन [...]