एक बड़े नेता ने भाषण दिया तो अखबार में साथ में उपस्थित होने वालों का पूरा ब्यौरा पूरी रिपोर्ट से बड़ी होती है।
अपने परिचय को लेकर सबसे ज्यादा सांसत में हम भारतीय ही दिखते हैं। मैं फलां हूं। लोगों को यह अहसास कराना कि हम भी कुछ हैं। इस कारण ही कई गलत हो जाते हैं।
यह ख्याल मेरे जेहन में आज सुबह एक पोस्टर देखने के बाद हुई। दिल्ली के त्रिलोकपुरी से शंकर भाटी को बसपा के युवा अध्यक्ष बनाए गए(अंदाजा लगाइए कितनी बड़ी खबर है) पूरा का पूरा इलाका पोस्टरों से भरा है। साथ में बड़े-बड़े बोर्ड और होर्डिग। भाटी जी की तस्वीर सबसे बड़ी होती है और साथ ही छोटी-छोटी तस्वीर मायावती, सतीश मिश्रा और कांशी राम की।
क्या गजब देश है? और क्या गजब के लोग?

अगस्त 19, 2007 को 10:55 पूर्वाह्न पर |
सही बात है। यह विषय कुछ लंबा भी खिंच सकता था।
ब्लागिंग में भी आइडेंटिटी क्राइसिस वाले कुछ तत्व छिपे होते हैं तभी चिल्लपों मचती है।
अगस्त 19, 2007 को 1:32 अपराह्न पर |
भयंकर है। पहचान का संकट तो भारतीय ग्रस्त और त्रस्त दोनों हैं। हिंदी पत्रकारिता में तो फूफा लोग अक्सर रौब गांठते मिल जाते हैं
अगस्त 20, 2007 को 9:16 पूर्वाह्न पर |
[...] My Dream Dream comes true…U’ll get everything… « भारतीयों में आइडेंटिटी क्राइसिस सबसे… [...]