चिट्ठा चोर या ‘भूखा’ चिट्ठेकार
देखने का नजरिया अलग है। किसी ने अगर आलोक पुराणिक जी के चिट्ठे से दो पोस्ट हू बहू कापी कर अपने चिट्ठे में डाल दिया तो क्या वह चोर हो गया? आप कहते होंगे, मैं उसे नहीं मानता। मैं उसे उसकी भूख मानता हूं।
आइडेंटिटी क्राइसिस की भूख। वह अच्छा लिखना नहीं जानता। क्रिएटिविटि नहीं है उसके पास। तो क्या करे! हम आप जो लिखते हैं उसका विचार हम अपने आस पास से लेते हैं। कोई कहीं के लिखे हुए एक लाईन से ही पूरी पोस्ट लिख देता है। कोई कुछ करता है तो कोई कुछ।
अभी कुछ दिन पहले मुझे एक चिट्ठेकार ने एक लिंक देकर यह बताया गया कि इस चिट्ठेकार ने कईयों की पोस्ट को अपने नाम से पब्लिश कर दी है। मैंने कहा यह तो बड़ी अच्छी बात है। मुफ्त में प्रचार हो रहा है। हां, वो अलग बात है कि आपका नाम नहीं दिया गया है। कोई बात नहीं। आपको पढ़ने वाले आपकी लेखनी को जानते हैं। नाहक आप परेशान ना होईए।
उन्होंने कहा कि यह तो गलत बात है कि बिना नाम दिए उसने यह सब काम कर दिया। मैंने कहा गलत तो है लेकिन आप कुछ कर नहीं सकते। और करना भी नहीं चाहिए। तब तक जब तक वह आपका प्रतियोगी ना बन जाए।
आपका लिखा हुआ पोस्ट अगर कोई दूसरा पब्लिश करता है तो वह बेचारा ‘भूखा’ है। आपने उसे खाना दिया है। ठीक है कि वह आपका नाम नहीं ले रहा है, लेकिन दिया आपने ही है। जिसे सब लोग जानते हैं।
इसलिए शोर मत मचाइए, भूखे को खाना देना पुण्य की बात है। खुश हो जाइए। इसमें आपका कोई नुकसान नहीं हो रहा है।
नोट: (आलोक पुराणिक जी का नाम मात्र उदाहरण के लिए दिया गया है)
August 20, 2007 at 9:08 am
ऐसे चिटठेकारों को शेक्सपियर, रविन्द्र नाथ टैगोर, मुंशी प्रेमचंद, ममता कालिया, नामवर सिंह से लेकर तस्लीमा नसरीन तक की किताबें और रचनाएं अपने नाम से भी छपवा लेनी चाहिए जिससे उसकी आर्थिक भूख भी मिट जाएगी। उसे नाम और दाम मिलेंगे तो और बड़ा पुण्य का काम होगा राजेश जी। यदि ऐसे लोग अनुवाद भी करें तो ओरिजनल लेखक का नाम कहीं न बताएं.. । अच्छा है ऐसे व्यक्ति दुनिया भर के लेखकों की रचनाएं खुद की पिछले जन्म में लिखी रचनाएं नहीं बता रहे हैं और मैं तो उसी दिन का इंतजार कर रहा हूं जब वे ऐसा बोले। आप धन्य हैं जो कह रहे हैं ……..इसलिए शोर मत मचाइए, भूखे को खाना देना पुण्य की बात है। खुश हो जाइए। इसमें आपका कोई नुकसान नहीं हो रहा है।
August 20, 2007 at 9:18 am
कोई नही कर सकता । इन सभी लेखकों कि किताबो पर कापी राइट होता है । इस पर भी लिखूंगा थोडा लिख भी चूका हु यहा देखे
August 20, 2007 at 10:25 am
यदि कोई व्यक्ति इस तरह के नकल का उपयोग आर्थिक लाभ के लिये करता है तो वह इतनी अकल रखता है कि “चोरी” का मतलब समझ सके. सारी दुनिंयां के प्रतिलिप कानून कहते हैं कि यह चोरी है. हिन्दुस्तान में इसके लिये काफी कडी सजा एवं फाईन की व्यवस्था है — शास्त्री जे सी फिलिप
हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info
August 20, 2007 at 10:41 am
यहाँ तक तो ठीक है। समस्या तब आती है जब अमरीकी कंपनी बासमती को पेटेंट कराने लगे। इस परिपेक्ष्य में नकलची को देखें, तो वही कविता ध्यान आती है, क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो।
August 20, 2007 at 10:45 am
रिवाज है रीति है
हम देगे साथ गलत का
आप भी कैसे अपने को
अलग करते इस रीति रिवाज से
इस लिये अपने भी लिया है पक्ष
गलत का
लिखा होता उस दर्द को जो
मिलता है ओरिजनल लेखक को
जब वह देखता है अपने शब्दो को
उन शब्दो के साथ
जिन से वो जुड़ना नहीं चाहता है
नहीं चाहता की उसके बच्चे
अगर उसकी लखनी को कभी देखे
तो पाये की उसकी लेखनी के साथ
बहुत एसा जुड़ चूका है
जिसे पढ़ने के लिये
मना किया था उसने अपने बच्चो को
वैस पन्ना आप का है
सोच भी आप की है
पर आने वाली
पीढ़ियो की जिमेदारी क्या आप की नहीं है
August 20, 2007 at 10:47 am
रिवाज है रीति है
हम देगे साथ गलत का
आप भी कैसे अपने को
अलग करते इस रीति रिवाज से
इस लिये अपने भी लिया है पक्ष
गलत का
लिखा होता उस दर्द को जो
मिलता है ओरिजनल लेखक को
जब वह देखता है अपने शब्दो को
उन शब्दो के साथ
जिन से वो जुड़ना नहीं चाहता है
नहीं चाहता की उसके बच्चे
अगर उसकी लखनी को कभी देखे
तो पाये की उसकी लेखनी के साथ
बहुत एसा जुड़ चूका है
जिसे पढ़ने के लिये
मना किया था उसने अपने बच्चो को
वैस पन्ना आप का है
सोच भी आप की है
पर आने वाली
पीढ़ियो की जिमेदारी क्या आप की नहीं है
August 20, 2007 at 11:21 am
आलोक जी जब कोई कानून बनता है तो यह समझ लीजिये कि उसकी जानकारी को रखनी चाहिऐ । अगर हम नही रख रहे हैं तो हम निश्चित रूप से बेवकूफ हैं ।
लड़ने का बड़ा ही साधारण नियम है सामने वाला जिस भी TOOL से लड़ रह हो आप भी उसी TOOL का उपयोग करे ।
आज के समय में जो भी कानून और टेक्नोलॉजी को जनता है वो आगे निकल जायेगा
August 20, 2007 at 3:37 pm
चिट्ठाकार यह भूल गया कि वे यदि एक कानून के उलंघन की वकालात करते हैं तो कल को जब उनके व्यक्तिगत जीवन में चोरी, लूट, अन्य अपराध आदि से मुठभेड होगी तो उनको कानून एवं व्यवस्था की मदद खोजने का कोई अधिकार नहीं होगा. जो उलंघन की वकालात करता है वह कानून से मदद की याचना कैसे कर सकता है ??
August 20, 2007 at 3:58 pm
आप या तो महात्मा हैं या फिर…..नही तो ऐसे विचार नही रखते । कोई चिठ्ठाकार जब कुछ लिखता है तो वह आत्मिकरूप से अपनी रचना के साथ जुड़ा होता है । इस तरह की चोरी रचनाकार को बहुत आहत करती है । आप के ये विचार कि-
“देखने का नजरिया अलग है। किसी ने अगर आलोक पुराणिक जी के चिट्ठे से दो पोस्ट हू बहू कापी कर अपने चिट्ठे में डाल दिया तो क्या वह चोर हो गया? आप कहते होंगे, मैं उसे नहीं मानता। मैं उसे उसकी भूख मानता हूं।”
शायद अभी तक आपका ऐसी चोरी से पाला नही पड़ा । भगवान ना करे कही आप की कोई प्रिय वस्तु या जिसे आप बहुत प्यार करते हैं कोई दूसरा चुरा कर ले जाएगा,उस दिन शायद आप अपने विचारों को बदलनें को जरूर मजबूर हो जाएगें ।
August 20, 2007 at 5:11 pm
महोदय,
आप तो सपनो मे रहते है, सपने रात मे देखे जाते है और चोरिया भी रात मे की जाती है इस लिहाज से आपके उदगार सही है. यह काम ना तो मर्दो का है और ना ही औरतो का . समाज मे नपुन्सक लोगो के लिये एक व्यवस्था है और आने वाले दिनो मे नेट पर भी इसकी जरुरत पडेगी. मेरे खयाल से इसके मुखिया बनने के आपमे सभी गुढ मौजूद है.
एक बात और नपुन्सक लोग भी चोरी नही करते.
August 21, 2007 at 2:27 am
मेरे साथ कोई झंझट नहीं। मेरा कॉपीराईट आपको न केवल यह करने देता है पर कहता है कि ऐसा करिये। आज से छः महीने पहले यह विवाद चला था तब भी मेरा विचार था कि यह डकैती, चोरी या जोश या केवल नादानी है और आज भी।
August 21, 2007 at 12:54 pm
The people who steals should be treated with sympath. You know a desire to steal comes under a psychological malady called kleptomania. And people supporting such act should also get themselves treated for psychological disorders. And I am startled to see that you are also supporting this thing. Its really very pathetic. Shame on you if you are mentally alright and if not then get yourself examined. You prevert swine, peace of shit.
August 21, 2007 at 8:25 pm
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