जागरण डॉट काम हुआ अब याहू जागरण डॉट काम

August 11, 2007 by Rajesh Roshan

यह बताता है कि हिंदी का बाजार बढ़ रहा है। दैनिक जागरण ने बाजार को बताया कि हिंदी भी अपना बाजार कायम कर सकता है। पहले अखबार के जरिए। दैनिक जागरण विश्व का सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला अखबार है। और अब इंटरनेट के जरिए। हिंदी का पाठक जागरण डाट काम से वाकिफ है। अब यह दैनिक जागरण और याहू दोनों के संयुक्त प्रयास से चलेगा।

याहू का किसी हिंदी न्यूज पोर्टल के साथ गठजोड़ यह बताने के लिए काफी है कि हिंदी का बाजार कितनी तेजी से बढ़ रहा है। दैनिक जागरण का उदय 1997 में हुआ था। अपने निर्माण के दस साल बाद इसने जो मुकाम हासिल किया है, उसे छू पाना इसके प्रतियोगियों के लिए काफी मुश्किल है।

फिलहाल इसका बीटा वर्जन लांच किया गया है। साथ ही इसका पुराना वर्जन भी चल रहा है, जो धीरे-धीरे हट जाएगा। तो हम अब हम अपने जागरण को अब नए रूप में देख सकते हैं।

जागरण-याहू बीटा वर्जन

सठियाना किसे कहते हैं, इसे पढ़िये

August 11, 2007 by Rajesh Roshan

सच्ची घटना पर आधारित। आप बीती सुना रहा हूं। कोई मजाक ना समझे। यह समझ लें कि जब आप बुढ़ा जाएं तो ऐसा कुछ भी ना करें। नहीं तो कोई आपके बारे में भी कोई कुछ कहेगा या लिख देगा।

मुझे थोड़ी जल्दी थी। दफ्तर से बिना पूछे अपने काम से निकला था। काम पूरा कर फिर दफ्तर भी लौटना था। मुझे जरूरत थी अपने आई कार्ड के फोटो कापी की। दुकान पर गया तो देखा एक बुजुर्ग रौकिंग चेयर पर आराम फरमा रहे थे। हाथ में पका हुआ भुट्टा। यूं कहिए कि बस मजे ले रहे थे। मैंने कहा कि फोटो कापी कराना है। उन्होंने पूछा क्या है? मैंने आई कार्ड दिखाया.. उन्होंने इशारा करते हुए बताया कि आगे दुकान है, वहां से करा लो, मैं नहीं कर पाऊंगा।

मुझे जल्दी तो थी ही, मैंने निवेदन किया। उत्तर में उन्होंने कहा कि आगे चले जाओ वहां हो जाएगा।

मैं आगे चला गया। वहां की फोटो कापी मशीन खराब थी। वापस लौटा। पुन: उसी दुकान पर। मैंने कहा कि मुझे इसकी जरूरत है। प्लीज कर दीजिए। उन्होंने कहा मैं एक-दो कापी नहीं करता हूं। आगे एक और मार्केट है, वहां चले जाओ हो जाएगा। मैंने कहा कि एक नहीं दस कर दीजिए लेकिन कर दीजिए।

बुजुर्ग ने कहा, जब जरूरत एक की है तो दस क्यों? मैंने कहा एक और दस ज्यादा मतलब है कि मुझे जरूरत और जल्दी दोनो है। उसने फिर मुझे कहा कि आगे वाली मार्केट में चला जाऊं। मैंने कहा आप दस के पैसे ले लीजिए।

अब बुजुर्ग कहता है कि एक मैं करता नहीं हूं। दस करूंगा तो कहोगे कि पैसे का भूखा है। मुझे पैसे कमाने का शौक नहीं है। आगे चले जाओ वहां से करा लो।

क्या बुजुर्ग(बुड्ढा) सठिया हुआ नहीं था?

मजेदार चोरी

August 10, 2007 by Rajesh Roshan

यह कैसे हो सकता है! यही पूछेंगे ना आप कि चोरी कैसे मजेदार हो सकता है? लेकिन मेरे लिए यह मजेदार ही है। सच में मजेदार..।

मेरे पास एक बाईक है और उसे झाड़ने पोंछने के लिए मैं उसमें एक कपड़ा रखता हूं, जैसे सभी रखते हैं। जब भी मैं किसी पब्लिक पार्किग में गाड़ी खड़ी करता हूं कोई ना कोई मेरे उस गंदे कपड़े को ले उड़ता है। मैं जब गाड़ी के पास जाता हूं तो अपने गाड़ी में रखे कपड़े को ना पाकर बगल की गाड़ी के रखे कपड़े को ले उड़ता हूं।

जब कपड़ा निकालता होता हूं तो डर लगता रहता है कि कहीं गाड़ी का मालिक आकर मुझे ये ना कहे कि क्यों भाई मेरा क्यों निकाल रहे हो। कहीं और से जुगाड़ कर लो।

तो है ना यह मजेदार चोरी।

‘मेरा भारत परेशान’ से ‘मेरा भारत महान’ तक

August 5, 2007 by Rajesh Roshan

भारत के आम नागरिकों की राय है यह। कोई भारत से परेशान है तो कोई भारत को महान कहता है। आम भारतीय वर्तमान में जीता है। इन्हें भूत और भविष्य से कोई मतलब नहीं। हड़ताल में यह परेशान होता है। और ज्यादा मजदूरी मिलने पर खुश हो जाता है।

आज का भारत 60 साल का नौजवान भारत है। इसकी रफ्तार से हर कोई अचंभित है। देशी विदेशी सभी इसके तारीफ कर रहे हैं। अमेरिका परमाणु समझौते को लेकर भारत से ज्यादा उत्सुक है।

टाइम ने अपने वर्तमान अंक में भारत की तारीफ की है। आजादी के 60 साल पूरे होने पर टाइम ने भारत पर विशेषांक प्रकाशित किया है। टाइम से पहले कई और विदेशी अखबारों और चैनलों ने भारत की ओर नजरें इनायत की हैं (इसे देख लें)

मेगास्थनीज, इब्नबतूता, फाहियान, ह्वेन स्वांग ने भारत की तारीफ में कसीदे पढ़े हैं। सभी भारत की ओर ही ताक रहें हैं। विकिपिडिया पर किसी देश के पेज को पढ़ने में अमेरिका के बाद भारत के पेज का नंबर है। भारत और भारत की चीजें आज विश्व भर में लोकप्रिय हो रहीं हैं। लंदन में पनीर टिक्का की बिक्री बर्गर के करीब-करीब है। विदेशी महिलाओं को साड़ी में काफी पसंद है।

आज से बीस साल पहले टाटा और बिड़ला भारत में भारत के सबसे बड़े ब्रांड एंबेस्डर थे। टाटा-बिड़ला सभी के जुबान पर थे। यही हाल आज पूरे विश्व का है। आईटी, स्टील, फिल्म और साहित्य में भारत का परचम अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और खाड़ी देशों पर लहरा रहा है।

कोरस को खरीदने की भारी भरकम डील की खबर हो या अरुंधति राय व अनिता देसाई को बुकर पुरस्कार मिलने की खबर। हम आगे बढ़ रहे हैं। धीरे-धीरे। सपेरों के देश से अमीरों के देश बनने की कहानी भी दुनिया वाले आंखें फाड़-फाड़ कर देख और पढ़ रहे हैं। विदेशियों की रुचि पौराणिक योग में भी बढ़ी है।

क्रमश:

‘मेरा भारत परेशान’ से ‘मेरा भारत महान’ तक

August 5, 2007 by Rajesh Roshan

भारत के आम नागरिकों की राय है यह। कोई भारत से परेशान है तो कोई भारत को महान कहता है। आम भारतीय वर्तमान में जीता है। इन्हें भूत और भविष्य से कोई मतलब नहीं। हड़ताल में यह परेशान होता है। और ज्यादा मजदूरी मिलने पर खुश हो जाता है।

आज का भारत 60 साल का नौजवान भारत है। इसकी रफ्तार से हर कोई अचंभित है। देशी विदेशी सभी इसके तारीफ कर रहे हैं। अमेरिका परमाणु समझौते को लेकर भारत से ज्यादा उत्सुक है।

टाइम ने अपने वर्तमान अंक में भारत की तारीफ की है। आजादी के 60 साल पूरे होने पर टाइम ने भारत पर विशेषांक प्रकाशित किया है। टाइम से पहले कई और विदेशी अखबारों और चैनलों ने भारत की ओर नजरें इनायत की हैं (इसे देख लें)

मेगास्थनीज, इब्नबतूता, फाहियान, ह्वेन स्वांग ने भारत की तारीफ में कसीदे पढ़े हैं। सभी भारत की ओर ही ताक रहें हैं। विकिपिडिया पर किसी देश के पेज को पढ़ने में अमेरिका के बाद भारत के पेज का नंबर है। भारत और भारत की चीजें आज विश्व भर में लोकप्रिय हो रहीं हैं। लंदन में पनीर टिक्का की बिक्री बर्गर के करीब-करीब है। विदेशी महिलाओं को साड़ी में काफी पसंद है।

आज से बीस साल पहले टाटा और बिड़ला भारत में भारत के सबसे बड़े ब्रांड एंबेस्डर थे। टाटा-बिड़ला सभी के जुबान पर थे। यही हाल आज पूरे विश्व का है। आईटी, स्टील, फिल्म और साहित्य में भारत का परचम अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और खाड़ी देशों पर लहरा रहा है।

कोरस को खरीदने की भारी भरकम डील की खबर हो या अरुंधति राय व अनिता देसाई को बुकर पुरस्कार मिलने की खबर। हम आगे बढ़ रहे हैं। धीरे-धीरे। सपेरों के देश से अमीरों के देश बनने की कहानी भी दुनिया वाले आंखें फाड़-फाड़ कर देख और पढ़ रहे हैं। विदेशियों की रुचि पौराणिक योग में भी बढ़ी है।

क्रमश:

चौंकाने वाले आंकड़े!

August 4, 2007 by Rajesh Roshan

लिखने पढ़ने की आदत ने पहले पत्रकार बनाया और अब ब्लागर। इन दोनों मामलों में मैं अभी नया हूं। पत्रकारिता करते हुए महज दो साल हुए हैं। ब्लागिंग करते हुए 7 महीने।

आज एक लिंक ने मेरा बरबस मन खींच लिया। वर्डप्रेस पर रोजाना ब्लाग की रैंकिंग की जाती है। वहां की लिंक से आज की तारीख में मेरा सपना में कुल दो लोग आए। तो मुझे पता चला कि वर्डप्रेस पर बने ब्लागस पर मेरा सपना 67वें नंबर पर है।

अंग्रेजी के बीच हिंदी के दो ब्लाग टाप 100 में हैं। अमित जी का ‘दुनिया मेरी नजर से’ से 71वें नंबर पर है। इंटरनेट के बारे में जो मेरी जानकारी है वह कहती है कि ‘कंटेंट इज किंग’।

अगर आपके पास अच्छा कंटेंट है और इंटरनेट के दांव पेंच को थोड़ा बहुत भी जानते हों तो आप ही राजा हैं। आप लोगों के लिए मेरा सपना पर प्रतिदिन आने वाले लोगों का एक ग्राफ।

blog visitors

लिखिए और मस्त लिखिए। मुझे पूरा विश्वास है आने वाला समय हम हिंदी वालों का ही है।

मेरा एक दोस्त मुझे इन सब को देखकर कह रहा है कि अपने मुंह मियां मिठ्ठू बनना। मैंने उसकी बात को सही मान ली। आप भी ऐसा कह सकते हैं। लेकिन मैं सच बताऊं मैं आत्ममुग्ध कम होता हूं।

आह! ये इंटरनेट ‘यारी’ से परेशान हो गया हूं

August 3, 2007 by Rajesh Roshan

ऐसा लगता है जैसे ‘यारी’ की बाढ़ आ गई है। पिछले सात दिनों में मुझे ‘यारी’ सोशल नेटवर्किग साइट की ओर से कुल 23 लोगों ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया। मैं आकरुट पर रजिस्टर हूं। वहां से मुझे एक सीख मिली। सोशल नेटवर्किग साइट्स से जितना फायदा नहीं है उससे कहीं ज्यादा घाटा मुझे दिखता है।

आकरुट को मैं कॉपी-पेस्ट की दुनिया कहता हूं। यहां एक की कापी मारकर दूसरे को चिपका दिया जाता है। यारी से पहले ‘टैग्गड’ ने भी मुझे परेशान किया था। मुमकिन है आप लोगों को भी..।

यह इंटरनेट की दुनिया है यारों, जरा बच के। इस दुनिया की खास बात यह है कि यहां अच्छी चीजें कम, बुरी चीजें ज्यादा मिलती हैं। आपको संभल कर अच्छी चीजों को उठाना होगा। भीड़ को देखकर आप भी उनके साथ ना हो लें।

आह! ये इंटरनेट ‘यारी’ से परेशान हो गया हूं

August 3, 2007 by Rajesh Roshan

ऐसा लगता है जैसे ‘यारी’ की बाढ़ आ गई है। पिछले सात दिनों में मुझे ‘यारी’ सोशल नेटवर्किग साइट की ओर से कुल 23 लोगों ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया। मैं आकरुट पर रजिस्टर हूं। वहां से मुझे एक सीख मिली। सोशल नेटवर्किग साइट्स से जितना फायदा नहीं है उससे कहीं ज्यादा घाटा मुझे दिखता है।

आकरुट को मैं कॉपी-पेस्ट की दुनिया कहता हूं। यहां एक की कापी मारकर दूसरे को चिपका दिया जाता है। यारी से पहले ‘टैग्गड’ ने भी मुझे परेशान किया था। मुमकिन है आप लोगों को भी..।

यह इंटरनेट की दुनिया है यारों, जरा बच के। इस दुनिया की खास बात यह है कि यहां अच्छी चीजें कम, बुरी चीजें ज्यादा मिलती हैं। आपको संभल कर अच्छी चीजों को उठाना होगा। भीड़ को देखकर आप भी उनके साथ ना हो लें।

आईएएस और आईएएस का मक्का मुखर्जी नगर-अंतिम भाग

July 31, 2007 by Rajesh Roshan

आज जब मैं इसे लिख रहा हूं तो मुमकिन है कि कई लोगों का दिल बैठा जा रहा होगा। आज आईएएस के प्री का रिजल्ट आने वाला है। दिल बैठने वालों की संख्या ज्यादा होती है। इसके बरक्श जिनकी बल्लियां उछलेंगी उनकी संख्या कम होती है।

1997 में लगभग 13 लाख लोगों ने आईएएस बनने के लिए फार्म भरे थे। वह एक रिकार्ड है। इस साल लगभग एक लाख लोगों ने फार्म भरा था। इस साल से यूपीएसी ने प्री में निगेटिव मार्किग शुरू की है। दर्द देने वाला निर्णय है।

आज की शाम हर रोज की शाम की तरह नहीं होगी। बत्तरा पर भीड़ नहीं के बराबर होगी। जो आज क्वालिफाई करेंगे वो ठेके के बाद सीधे कमरे पर जाएंगे। और जो नहीं क्वालिफाई करेंगे उनके लिए भी कुछ ऐसा ही होगा।

सितंबर और अक्टूबर में त्योहारों का मौसम होता है। इस त्योहारों के मौसम में मेंस देने वाले अपना पसीना बहा रहे होते हैं। यही एक समय होता है जब इनकी दोस्ती दोस्तों से कम किसी ऐसे चीज से ज्यादा होती है जो इन्हें सोने ना दे। सिगरेट, चाय, तंबाकू, गुटखा यह कुछ भी हो सकता है।

मेंस देने वाले हर तीन में से एक को साक्षात्कार के लिए चुना जाता है। साक्षात्कार का समय भी होली के ठीक बाद का होता है। इसका साफ-साफ मतलब है कि साक्षात्कार तक जाने वाले विद्यार्थी त्योहारों का मजा नहीं ले पाते। साक्षात्कार में भी हर तीन में से एक को उस पद के लिए चुना जाता है जिसके लिए वह इतनी मेहनत कर रहा होता है।

चुने जाने के बाद भी कई अफसोस करते होते हैं। मैं आईएएस नहीं बन पाया। ये जोनल पोस्ट आफिस का हेड होना भी कोई नौकरी है। सभी की उम्मीदें आईएएस, आईपीएस, आईएफएस बनने की होती है। लेकिन वो बड़ा मशहूर शेर याद आ रहा है-

बनाने वाले तूने कोई कमी नहीं की
अब किसे क्या मिला, यह तो मुकद्दर की बात है॥

आईएएस और आईएएस का मक्का मुखर्जी नगर-2

July 30, 2007 by Rajesh Roshan

शाम का समय। सरकार के एसबीआई बैंक से लेकर के वी कामथ के आईसीआईसीआई बैंक के एटीएम में कतारबद्ध लड़के-लड़कियां। आलू, चावल, दाल के लिए पैसे निकालते हुए।

आज के आईएएस की तैयारी करने वाले छात्र मितव्ययी तो एकदम नहीं होते। सिगरेट और चाय में इनके सबसे ज्यादा पैसे खर्च होते हैं।

दिल्ली आने के बाद इनको जो सबसे ज्यादा दिक्कत होती है वह है एड्रेस प्रूव की। इनका कोई निश्चित ठिकाना तो होता नहीं है। आज यहां हैं तो कल कहीं और। वैसे एड्रेस प्रूव की जरूरत इन्हें दो मौकों पर ज्यादा होती है। सिम कार्ड या फिर बैंक खाता खुलवाने के वक्त। वैसे यह दिक्कत हर शहर में हर नए शख्स को होती है।

इन होनहारों की एक और खास बात होती है यह सफाई खुद से नहीं करते हैं। इन्हें 300 रुपये प्रतिमाह में कूक और 50 रुपये प्रतिमाह में कूड़ा उठाने वाला/वाली बड़े आसानी से मिल जाती है। दिल्ली में सकरुलेशन को लेकर लड़ने वाले दो बड़े अखबार इनकी पसंद नहीं होते। इनके ‘द हिंदू’ आता है। वह अलग की बात है कि उसे भी यह पढ़ते कम ही हैं। प्रतियोगिता दर्पण यहां की हाट मैगजीन है।

अगर इन इलाकों में सबसे ज्यादा कोई परेशान है तो वह हैं मकान मालिक। इनका दर्द कोई नहीं सुनता। कम से कम यह छात्र तो एकदम नहीं। 100 में से 70 मकानों में छात्र की जमघट लगी ही रहती है। आप किसी परिचित छात्र के यहां जाने पर आपका दोस्त कम से कम अपने पांच दोस्तों से आपका परिचय कराता है।

इनकी बातें एक आम जागरूक इंसान के लिए हमेशा मजेदार होतीं हैं। इतिहास के गर्भ से कभी भी आपको ये कोई हीरा तो कभी कोई पत्थर के बारे में बता सकते हैं। हिंदी की बात चलेगी तो बीच-बीच में अज्ञेय, नागाजरुन, प्रेमचंद, दिनकर, महादेवी की पंक्तियां आपको लुभाएंगी। इनके पास बताने को बहुत कुछ होता है। समाज के जोड़-तोड़ के बारे में, इसकी संरचना, जातिगत व्यव्स्था के बारे में समाजशास्त्र वैकल्पिक विषय रखने वाला छात्र आपको बहुत कुछ बता जाएगा।

और भी बहुत कुछ..बाद में