मेरा सपना को 50000 लोगो ने सहलाया

नवम्बर 2, 2007 by

आज मैं खुश हू. जब मैंने ब्लॉग लिखना शुरू किया था टू कुछ सोच के नही शुरू किया था. लिखने पढने की आदत ने ब्लॉग बना दिया और लिखता गया. आज इसका हिट काउंटर 50000 के पार हो गया. जो कम से कम मुझे तो हतप्रभ कर रहा है. इस बीच गूगल का पीआर रैंक भी 4 हो गया है. ये सब अच्छी चीजे हैं. लेकिन इंटरनेट को मैं जितना समझ पता ह उसमे यह कंटेंट हमेशा किंग होता है.

इसमे लिखे गए हमे मस्ती और सेक्स चाहिए और शकीरा.. इन दो पोस्ट पर ही केवल ५००० से जायदा हिट मिले हैं. जो मुझे थोड़ा दुखी करता है है. मैं यह नही चाहता की लोग ऐसे कीवर्ड से ब्लॉग पर आए. इसी पोस्ट पर आए लेकिन किसी और कीवोर्ड के साथ, तब मुझे खुशी होगी.

खैर फिलहाल तो मैं अब अपने दुसरे ब्लॉग राजेश रोशन डॉट कॉम पर लिखता हू. जिसपर मैंने हिट काउंटर नही लगाया हुआ है. क्योंकि ब्लॉग के अच्छे होने या न होने का यह कोई पैमाना नही है. तो मेरे दोस्तो लिखते रहिये अच्छा लिखिए. हिट पाने के लिए मत लिखिए. अच्छा लिखेंगे हिट आपको ख़ुद ब ख़ुद मिलेंगे.🙂

विश्वास कीजिये अंधविश्वास नही; तहलका के स्टिंग के मुतालिक

अक्टूबर 26, 2007 by

सभी की अपनी अलग विचारधारा होती है. मुमकिन है पुत्र के विचार पिता से न मिले और ये भी देखा गया है की पुत्र पिता का अंधभक्त होता है. सबके अपने विचार हैं और वही उनकी विचारधारा बनाती है. तहलका ने एक स्टिंग ऑपरेशन किया; ऑपरेशन कलंक. अभी ये आया ही था की मेरे ऑफिस के मेरे सहयोगियों के तरफ़ से कई सारी प्रतिक्रियाये आने लगी. अब ये हो जाएगा, अब वो हो जाएगा. कुछ के शब्द दूसरो के शब्दों से टकराने लगे. माहौल गर्म हो रहा था.  ब्लोग्गिंग में भी यही हो रहा है. एक के पोस्ट दूसरे के पोस्ट से टकरा रहे हैं, तो कही कमेंट से कमेंट.

मुद्दे की बात यह है की आप आंखो देखी पर विश्वास कीजिये. किसी भी चीज पर अंधविश्वास मत कीजिये. अन्धविश्वास वो करते हैं जो पढे लिखे नही होते हैं. और माशाल्लाहा हम लोग तो पढे लिखे लोग हैं. बाकि आप लोग बेहतर समझ सकते हैं. ये राजनीति के दावपेंच हैं या अगर आप अंधविश्वास करेंगे तो किसी दिन आप उसमे ख़ुद फंस सकते हैं.
Democracy is a daily excercise. लोकतंत्र को बनने में हर रोज मेहनत करनी पड़ती है

indian flag enblem

इसे कहते हैं बेजोड़ तालमेल

अक्टूबर 10, 2007 by

एक गाना लेकिन गाने वाले दो. दोनों अपने जगह महान. जिस किसी ने भी इन दोनों गानों को मिलाया है एक अच्छी सोच और अच्छा काम. बेहतरीन, लाजवाब आप इसे सुनिये और अच्छा न लगे ऐसा हो नही सकता. मैंने इस गाने को जहा से लिया है केवल उसका कला पक्ष है की अपलोड करने वाले की आइद है गुरू ऑफ़ सेक्स. उसके बावजूद मैं इतने अच्छे काम के लिए उसे बधाई देना चाहूँगा

ये केवल महान नुसरत फतह अली खान की आवाज में

और ये लता मंगेशकर की आवाज में

एक कार्टून: ये है असली सेतुसमुद्रम की लडाई

सितम्बर 17, 2007 by

setusamudram

बच गए हमलोग!!!

अगस्त 21, 2007 by

सूर्य का जीवन जीने के लिए होना बहुत जरूरी है। इसके बगैर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। एवरेस्ट में चढ़ना काफी मुश्किल है। आदमी एवेरस्ट पर चढ़ गया। वहां से टनों कचरा मिल रहा है। शायद प्रकृति ने इसलिए सूर्य को आदमी की पहुंच से दूर बनाया है।

चिट्ठा चोर या ‘भूखा’ चिट्ठेकार

अगस्त 20, 2007 by

देखने का नजरिया अलग है। किसी ने अगर आलोक पुराणिक जी के चिट्ठे से दो पोस्ट हू बहू कापी कर अपने चिट्ठे में डाल दिया तो क्या वह चोर हो गया? आप कहते होंगे, मैं उसे नहीं मानता। मैं उसे उसकी भूख मानता हूं।

आइडेंटिटी क्राइसिस की भूख। वह अच्छा लिखना नहीं जानता। क्रिएटिविटि नहीं है उसके पास। तो क्या करे! हम आप जो लिखते हैं उसका विचार हम अपने आस पास से लेते हैं। कोई कहीं के लिखे हुए एक लाईन से ही पूरी पोस्ट लिख देता है। कोई कुछ करता है तो कोई कुछ।

अभी कुछ दिन पहले मुझे एक चिट्ठेकार ने एक लिंक देकर यह बताया गया कि इस चिट्ठेकार ने कईयों की पोस्ट को अपने नाम से पब्लिश कर दी है। मैंने कहा यह तो बड़ी अच्छी बात है। मुफ्त में प्रचार हो रहा है। हां, वो अलग बात है कि आपका नाम नहीं दिया गया है। कोई बात नहीं। आपको पढ़ने वाले आपकी लेखनी को जानते हैं। नाहक आप परेशान ना होईए।

उन्होंने कहा कि यह तो गलत बात है कि बिना नाम दिए उसने यह सब काम कर दिया। मैंने कहा गलत तो है लेकिन आप कुछ कर नहीं सकते। और करना भी नहीं चाहिए। तब तक जब तक वह आपका प्रतियोगी ना बन जाए।

आपका लिखा हुआ पोस्ट अगर कोई दूसरा पब्लिश करता है तो वह बेचारा ‘भूखा’ है। आपने उसे खाना दिया है। ठीक है कि वह आपका नाम नहीं ले रहा है, लेकिन दिया आपने ही है। जिसे सब लोग जानते हैं।

इसलिए शोर मत मचाइए, भूखे को खाना देना पुण्य की बात है। खुश हो जाइए। इसमें आपका कोई नुकसान नहीं हो रहा है।

नोट: (आलोक पुराणिक जी का नाम मात्र उदाहरण के लिए दिया गया है)

चिट्ठा चोर या ‘भूखा’ चिट्ठेकार

अगस्त 20, 2007 by

देखने का नजरिया अलग है। किसी ने अगर आलोक पुराणिक जी के चिट्ठे से दो पोस्ट हू बहू कापी कर अपने चिट्ठे में डाल दिया तो क्या वह चोर हो गया? आप कहते होंगे, मैं उसे नहीं मानता। मैं उसे उसकी भूख मानता हूं।

आइडेंटिटी क्राइसिस की भूख। वह अच्छा लिखना नहीं जानता। क्रिएटिविटि नहीं है उसके पास। तो क्या करे! हम आप जो लिखते हैं उसका विचार हम अपने आस पास से लेते हैं। कोई कहीं के लिखे हुए एक लाईन से ही पूरी पोस्ट लिख देता है। कोई कुछ करता है तो कोई कुछ।

अभी कुछ दिन पहले मुझे एक चिट्ठेकार ने एक लिंक देकर यह बताया गया कि इस चिट्ठेकार ने कईयों की पोस्ट को अपने नाम से पब्लिश कर दी है। मैंने कहा यह तो बड़ी अच्छी बात है। मुफ्त में प्रचार हो रहा है। हां, वो अलग बात है कि आपका नाम नहीं दिया गया है। कोई बात नहीं। आपको पढ़ने वाले आपकी लेखनी को जानते हैं। नाहक आप परेशान ना होईए।

उन्होंने कहा कि यह तो गलत बात है कि बिना नाम दिए उसने यह सब काम कर दिया। मैंने कहा गलत तो है लेकिन आप कुछ कर नहीं सकते। और करना भी नहीं चाहिए। तब तक जब तक वह आपका प्रतियोगी ना बन जाए।

आपका लिखा हुआ पोस्ट अगर कोई दूसरा पब्लिश करता है तो वह बेचारा ‘भूखा’ है। आपने उसे खाना दिया है। ठीक है कि वह आपका नाम नहीं ले रहा है, लेकिन दिया आपने ही है। जिसे सब लोग जानते हैं।

इसलिए शोर मत मचाइए, भूखे को खाना देना पुण्य की बात है। खुश हो जाइए। इसमें आपका कोई नुकसान नहीं हो रहा है।

नोट: (आलोक पुराणिक जी का नाम मात्र उदाहरण के लिए दिया गया है)

भारतीयों में आइडेंटिटी क्राइसिस सबसे ज्यादा!!

अगस्त 19, 2007 by

Posters

एक बड़े नेता ने भाषण दिया तो अखबार में साथ में उपस्थित होने वालों का पूरा ब्यौरा पूरी रिपोर्ट से बड़ी होती है।

अपने परिचय को लेकर सबसे ज्यादा सांसत में हम भारतीय ही दिखते हैं। मैं फलां हूं। लोगों को यह अहसास कराना कि हम भी कुछ हैं। इस कारण ही कई गलत हो जाते हैं।

यह ख्याल मेरे जेहन में आज सुबह एक पोस्टर देखने के बाद हुई। दिल्ली के त्रिलोकपुरी से शंकर भाटी को बसपा के युवा अध्यक्ष बनाए गए(अंदाजा लगाइए कितनी बड़ी खबर है) पूरा का पूरा इलाका पोस्टरों से भरा है। साथ में बड़े-बड़े बोर्ड और होर्डिग। भाटी जी की तस्वीर सबसे बड़ी होती है और साथ ही छोटी-छोटी तस्वीर मायावती, सतीश मिश्रा और कांशी राम की।

क्या गजब देश है? और क्या गजब के लोग?

क्या आप अजातशत्रु बन पाएंगे?

अगस्त 18, 2007 by

लोग कहते हैं ना चाहने से क्या नहीं होता है! सब कुछ हो जाता है! क्या सच में सब कुछ हो सकता है? क्या आप जीते जिंदगी अजातशत्रु बन सकते हैं। अजातशत्रु। वो जिसका कोई शत्रु ना हो।

आत्मविश्वास और धैर्य उसकी दो सबसे बड़ी पूंजी है। वह घड़ी के समान है। जो हमेशा चलती रहती है। उसका गुण धीरे-धीरे निखर कर आता है। पांच या दस मिनट में वह किसी को प्रभावित नहीं करता है। और ना ही पांच या दस दिनों में। उसका असली गुण आपके सामने कुछ महीनों में आपको दिखता है।

मेरा एक दोस्त है। उम्र यही कोई 27-28 होगी। वह भी पत्रकार है। जितना मैं उसके बारे में जानता हूं, उसके मुताबिक वह जीते जिंदगी अजातशत्रु बना हुआ है। मेरे जैसे कई दोस्त हैं उसके। यूं कहिए लंबी फेहरिस्त है। लेकिन कोई उसका शत्रु नहीं है। कोई उसका बुरा नहीं चाहता। कोई उससे ईष्र्या नहीं करता। गजब है वो। उसके लिए मैं हमेशा एक बात लोगों को बोलता, बहुत ही सरल है वो।

सिंपली आउटस्टैंडिंग। बहुत आगे जाएगा मेरा यह दोस्त सिद्धार्थ।

स्वतंत्रता आज भी कुछ मांग रही है?

अगस्त 15, 2007 by

जय हिंद! स्वतंत्रता दिवस पर सभी भारतवासियों को ढेरों मुबारकबाद। यह स्वतंत्रता सबको मिले। हमें बहुत कुछ मिला है। लेकिन क्या यह बहुत कुछ सबों को मिला है?

ढाबे में काम करने वाले बच्चों को सामाजिक स्वतंत्रता। गरीबों और पिछड़ों को काम पाने की स्वतंत्रता। अगर यह नहीं है तो हमारा स्वतंत्र भारत के प्रति इतना भावुक होना बेमानी है। क्या आप इस स्वतंत्रता को पाने के लिए कुछ मदद कर सकते हैं? लोकतंत्र भारत चिल्ला रहा है। चीख-चीख कर चिल्ला रहा है। इसे सुनने के लिए कानों की नहीं आंखों की जरूरत है! क्या आप इसे सुन पा रहे है?