Archive for जुलाई, 2007

आईएएस और आईएएस का मक्का मुखर्जी नगर-अंतिम भाग

जुलाई 31, 2007

आज जब मैं इसे लिख रहा हूं तो मुमकिन है कि कई लोगों का दिल बैठा जा रहा होगा। आज आईएएस के प्री का रिजल्ट आने वाला है। दिल बैठने वालों की संख्या ज्यादा होती है। इसके बरक्श जिनकी बल्लियां उछलेंगी उनकी संख्या कम होती है।

1997 में लगभग 13 लाख लोगों ने आईएएस बनने के लिए फार्म भरे थे। वह एक रिकार्ड है। इस साल लगभग एक लाख लोगों ने फार्म भरा था। इस साल से यूपीएसी ने प्री में निगेटिव मार्किग शुरू की है। दर्द देने वाला निर्णय है।

आज की शाम हर रोज की शाम की तरह नहीं होगी। बत्तरा पर भीड़ नहीं के बराबर होगी। जो आज क्वालिफाई करेंगे वो ठेके के बाद सीधे कमरे पर जाएंगे। और जो नहीं क्वालिफाई करेंगे उनके लिए भी कुछ ऐसा ही होगा।

सितंबर और अक्टूबर में त्योहारों का मौसम होता है। इस त्योहारों के मौसम में मेंस देने वाले अपना पसीना बहा रहे होते हैं। यही एक समय होता है जब इनकी दोस्ती दोस्तों से कम किसी ऐसे चीज से ज्यादा होती है जो इन्हें सोने ना दे। सिगरेट, चाय, तंबाकू, गुटखा यह कुछ भी हो सकता है।

मेंस देने वाले हर तीन में से एक को साक्षात्कार के लिए चुना जाता है। साक्षात्कार का समय भी होली के ठीक बाद का होता है। इसका साफ-साफ मतलब है कि साक्षात्कार तक जाने वाले विद्यार्थी त्योहारों का मजा नहीं ले पाते। साक्षात्कार में भी हर तीन में से एक को उस पद के लिए चुना जाता है जिसके लिए वह इतनी मेहनत कर रहा होता है।

चुने जाने के बाद भी कई अफसोस करते होते हैं। मैं आईएएस नहीं बन पाया। ये जोनल पोस्ट आफिस का हेड होना भी कोई नौकरी है। सभी की उम्मीदें आईएएस, आईपीएस, आईएफएस बनने की होती है। लेकिन वो बड़ा मशहूर शेर याद आ रहा है-

बनाने वाले तूने कोई कमी नहीं की
अब किसे क्या मिला, यह तो मुकद्दर की बात है॥

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आईएएस और आईएएस का मक्का मुखर्जी नगर-2

जुलाई 30, 2007

शाम का समय। सरकार के एसबीआई बैंक से लेकर के वी कामथ के आईसीआईसीआई बैंक के एटीएम में कतारबद्ध लड़के-लड़कियां। आलू, चावल, दाल के लिए पैसे निकालते हुए।

आज के आईएएस की तैयारी करने वाले छात्र मितव्ययी तो एकदम नहीं होते। सिगरेट और चाय में इनके सबसे ज्यादा पैसे खर्च होते हैं।

दिल्ली आने के बाद इनको जो सबसे ज्यादा दिक्कत होती है वह है एड्रेस प्रूव की। इनका कोई निश्चित ठिकाना तो होता नहीं है। आज यहां हैं तो कल कहीं और। वैसे एड्रेस प्रूव की जरूरत इन्हें दो मौकों पर ज्यादा होती है। सिम कार्ड या फिर बैंक खाता खुलवाने के वक्त। वैसे यह दिक्कत हर शहर में हर नए शख्स को होती है।

इन होनहारों की एक और खास बात होती है यह सफाई खुद से नहीं करते हैं। इन्हें 300 रुपये प्रतिमाह में कूक और 50 रुपये प्रतिमाह में कूड़ा उठाने वाला/वाली बड़े आसानी से मिल जाती है। दिल्ली में सकरुलेशन को लेकर लड़ने वाले दो बड़े अखबार इनकी पसंद नहीं होते। इनके ‘द हिंदू’ आता है। वह अलग की बात है कि उसे भी यह पढ़ते कम ही हैं। प्रतियोगिता दर्पण यहां की हाट मैगजीन है।

अगर इन इलाकों में सबसे ज्यादा कोई परेशान है तो वह हैं मकान मालिक। इनका दर्द कोई नहीं सुनता। कम से कम यह छात्र तो एकदम नहीं। 100 में से 70 मकानों में छात्र की जमघट लगी ही रहती है। आप किसी परिचित छात्र के यहां जाने पर आपका दोस्त कम से कम अपने पांच दोस्तों से आपका परिचय कराता है।

इनकी बातें एक आम जागरूक इंसान के लिए हमेशा मजेदार होतीं हैं। इतिहास के गर्भ से कभी भी आपको ये कोई हीरा तो कभी कोई पत्थर के बारे में बता सकते हैं। हिंदी की बात चलेगी तो बीच-बीच में अज्ञेय, नागाजरुन, प्रेमचंद, दिनकर, महादेवी की पंक्तियां आपको लुभाएंगी। इनके पास बताने को बहुत कुछ होता है। समाज के जोड़-तोड़ के बारे में, इसकी संरचना, जातिगत व्यव्स्था के बारे में समाजशास्त्र वैकल्पिक विषय रखने वाला छात्र आपको बहुत कुछ बता जाएगा।

और भी बहुत कुछ..बाद में

दिल्ली की एक खास और अजीब बात

जुलाई 29, 2007

एक खास जिनके बारे में लोगों को पता होगा लेकिन लिखा नहीं गया। दिल्ली के खाने के बारे में कतई नहीं लिखूंगा। इस पर ब्लाग तो छोड़िए मोटी-मोटी किताबें लिखी जा चुकी हैं।

दिल्ली में एक फैशन पुरजोर है। हर बड़े शब्द को छोटा कर दीजिए। जिसे कहते हैं, शार्ट फार्म या एब्रीवियेशन। दिल्ली में चलने वाले कुछ पुराने शार्ट फार्म। आईटीओ, डीयू, जीके, साउथ एक्स, सीआर पार्क और भी कई हैं।

कुछ नए शाट फार्म। क्या आप इनके लांग फार्म जानते हैं? इंस्टी, सीसीडी, एनडी..। डीयू के तकरीबन हर कालेज को शार्ट फार्म ही लोग बोलते हैं। एलएसआर, एसआरसीसी, एमएच, सीएलसी, आईपी..।

कुछ न्यूज पेपर। टीओआई, ईटी, एचटी, एफई..।

और इसको बढ़ावा दे रहे हैं यहां के लोग, जो यहां के हैं नहीं। क्योंकि दिल्ली एक कोस्मोपोलिटन शहर है।

कुछ आपको पता हो तो आप इस लिस्ट को बढ़ा सकते हैं।

आईएएस और आईएएस का मक्का मुखर्जी नगर

जुलाई 29, 2007

अगर आपने आट्र्स की पढ़ाई की होगी या कर रहें होंगे तो आप भी आईएएस की तैयारी के बारे में सोचते होंगे। आपका जवाब नहीं है! मुझे सहज रूप से विश्वास नहीं हो रहा। मैं आपसे कहूंगा कि ईमानदारी से जवाब दें। हम भारतीय किसी बात का जवाब थोड़ा कम ईमानदारी से देते हैं।

और अगर आप इतिहास के विद्यार्थी रहे होंगे तो आप..।

मैं बुधवार को मुखर्जी नगर गया था। आईएएस का मक्का कहूं तो शायद कुछ गलत नहीं होगा। इसके दो-तीन किलोमीटर के एरिया में आट्रम लाईन, हकीकत नगर, परमानंद, नेहरू विहार, ढका गांव व अन्य कुछ छोटे जगह शामिल है।

छोटे-छोटे दर्जनों संस्थान से घिरा बत्तरा सिनेमा यहां के होनहारों के लिए शाम को चाय की चुस्की लेने का सबसे पसंदीदा स्पाट है। दो रुपये की चाय, ढाई रुपये की सिगरेट और तीस मिनट दोस्तों से बातचीत। यह शाम का माहौल है।

जागृति, लक्ष्य, दृष्टि, श्योर शाट, क्षितिज, केंद्र और ना जाने ऐसे ही कई प्रेरित करने वाले शब्दों से भरा है। यहां का पूरा आर्थिक बाजार इन विद्याथियों के सहारे ही चलता है। अक्टूबर में यहां मंदी आ जाती है। मेंस के बाद बहुत सारे विद्यार्थी अपने घर चले जाते हैं।

इन सबके साथ यहां के कुछ पार्को में आप उन जोड़ों को देख सकते हैं, जो पढ़ाई के साथ प्यार की पींगे भी बढ़ाते हैं। मेरे लिए वो भी वुड बी आईएएस की तरह हैं। कौन जाने प्यार की तरह वह अपने पढ़ाई पर भी पूरा केंद्रित कर लेते हों।

मेरे एक दोस्त ने बताया कि आज-कल में उनका प्री का रिजल्ट आने वाला है। उन सभी विद्यार्थियों को जिन्होंने आईएएस बनने को अपना सपना चुना है, उन्हें सलाम। क्योंकि मैं उतना हिम्मतवाला कभी नहीं बन सका।

Mukharjee Nagar in Wikimapia

मुफ्त मिलने वाली चीजें मुफ्त नहीं मिलती

जुलाई 25, 2007

भारत की अजीब बनावट का ही कमाल है कि यहां मुफ्त में मिलने वाली चीजें मुफ्त नहीं मिलती हैं। एफआईआर कराने के लिए पैसे देने पड़ते हैं। कोई जरूरी नहीं कि पैसे देने के बाद भी आपकी एफआईआर लिख ली जाए।

हम आप सभी के साथ ऐसा हुआ होगा। सरकारी काम कराने के लिए आपको बख्शीश देनी होती है। यह बख्शीश नहीं घूस होती है। ब्राइब। पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस, राशन कार्ड। आपको अधिकारी से लेकर पुलिस वाले को पैसा देना ही पड़ता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कल अपने एक आदेश में कहा है कि राज्य यह सुनिश्चित करे कि लोगों के एफआईआर लिखे जाए। रविवार रात दिलवालों की नगरी दिल्ली में कुछ 40-50 लड़कों की टोली ने उत्पात मचाया, जिसका कोई एफआईआर नहीं लिखा गया। यह है दिल्ली पुलिस, विथ यू, फार यू, आलवेज।

सुप्रीम कोर्ट के जज बीएन अग्रवाल ने अपना अनुभव बताया। कहा मेरी पत्नी और बेटी किसी मामले में पुलिस स्टेशन एफआईआर लिखाने गए थे जिसे लिखने में दो-तीन घंटे का समय लग गया। अगर सुप्रीम कोर्ट के जज साथ ऐसा हो सकता है तो आप अनुमान लगा सकते हैं।

आरटीआई इसका इलाज है। लोग आरटीआई को ही नहीं जानते।

क्या आप भी नही जानते ?

क्या नहीं करना चाहिए

जुलाई 24, 2007

अगर आपको यह पता है कि आपको क्या करना चाहिए तो सच मानिए आप अच्छे हैं। लेकिन अगर आपको यह भी पता है कि आपको क्या नहीं करना चाहिए तो फिर आप ग्रेट हैं। इन सबके उलट अगर आपको यह पता है कि क्या करना चाहिए लेकिन यह नहीं पता कि क्या नहीं करना चाहिए तो मुमकिन है कि आप..।

नजीर पेश करता हूं। मेरे एक दोस्त को शेरो-शायरी का शौक चढ़ा। धीरे-धीरे इस शौक के कारण उसे उर्दू सीखने की ललक जगी। उसने एक लुगत खरीदी और उससे कुछ शब्द अपनी डायरी में नोट करने लगा। करता करता परेशान हो गया। उसे उर्दू तो ना आई सारे दोस्त उसका मजाक उड़ाने लगा।

मेरे दोस्त को यह तो पता था कि उसे उर्दू सीखनी है। भाषा का ज्ञान होना तो बड़ी अच्छी बात है लेकिन उसके लिए उसे क्या नहीं करना चाहिए, उसे नहीं पता था। मेहनत में उसने कोई कमी नहीं की लेकिन गलत दिशा में।

स्टाक एक्सचेंज और अच्छी पत्रकारिता का संबंध

जुलाई 23, 2007

रामनाथ गोयनका पत्रकारिता सम्मान में 24 उत्कृष्ट पत्रकारों को सम्मानित किया गया है। इनमें से कुछ को तो हम पहचानते ही हैं। बाकियों को कुछ जानते होंगे।

कल रात एनडीटीवी पर उस दौरान हुई बहस को देख रहा था। क्या अच्छी पत्रकारिता बुरा व्यवसाय है?

वैसे इसके बीच में बता दूं कि आजकल मैं शेयर मार्केट में खरीद-फरोख्त भी कर रहा हूं। वहीं से जोड़ कर यह विचार आया जिसे मैं यहां लिख रहा हूं।

आज भारत के हिंदी चैनलों पर भूत, सांप, बाबा, औघड़, हाथी आपको खूब मिल जाएंगे। और इनसे तथाकथित खुशी मनाने वाली टीआरपी भी मिल जाती है। यह खबरें नहीं होती हैं वरण टीआरपी का फंडा होता है।

ठीक इसी तरीके से शेयर बाजार में अगर कोई चलताऊ शेयर ले ले और उसे कुछ मुनाफा हो जाए तो उसे यह कतई नहीं समझना चाहिए कि ऐसे स्टाक्स अच्छे होते हैं। आज मिल रहे हैं, कल डूब भी सकते हैं।

लेकिन यदि आप ब्लू चिप्स खरीदते हैं तो आपका पैसा डूबेगा नहीं। भले आप उसे आल टाईम हाई में ही क्यों ना खरीद रहें हों। भारतीय बाजार में अभी अति संभावना है।

अब इसी को हिंदी पत्रकारिता से जोड़ दें। हमेशा ‘ब्लू चिप’ रिपोर्ट बनाने चाहिए इसमें आपको मुनाफा मिल कर ही रहेगा। आज नहीं तो कल। और इसी कारण गोयनका पुरस्कार पाने वालों में सारे ऐसे नाम थे जिन्होंने ‘ब्लू चिप’ रिपोर्ट बनाई थीं।

यह केवल पत्रकारिता और शेयर बाजार के लिए नहीं बल्कि इसे हम आप आम जिंदगी में भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

कमेंट डालने पर ताला मत लगाईए

जुलाई 22, 2007

लोगों को इसके बारे में पता तो होगा ही। अभी-अभी मैंने किसी पोस्ट पर कमेंट दिया और वो कहता है कि बाद अप्रूवल मिलने के बाद कमेंट को अपलोड किया जाएगा। क्यों?? कुछ समझ नहीं आया।

लोग अपने घर में ताला लगा कर रखते हैं कि कोई गलत आदमी प्रवेश ना करे। कुछ चुरा के कोई ना ले जाए। आप कहीं गालियों से डर कर तो यह मोडरेशन नहीं लगा रखा है? अगर हां तो एक बात बता दूं, आप सभी लोगों को कि आप जब किसी के बारे में कुछ बोलते हैं तो आप उस शख्स से कहीं ज्यादा अपने बारे में बता रहें होते हैं कि आप कौन और क्या हैं।

इसलिए डरना छोड़िए आटो अप्रूवल को ऑन कर दीजिए। अगर किसी को तकनीकी परेशानी हो तो श्रीश जी आपकी मदद के लिए हमेशा तैयार हैं। यह मैंने उनसे बिना पूछे लिखा है क्योंकि मुझे उनके बारे में जो पता है वह यह बताती है कि श्रीश जी चिट्ठेकारों के मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।

घर से बहुत दूर हूं, किसी चीज की कमी खली है

जुलाई 21, 2007

दिल्ली में रहते हुए पांच साल से अधिक हो गए। पिछले दो सालों से अकेले रह रहा हूं। उस पर से यह भाव विहीन शहर। मेरा पड़ोसी मेरा नाम नहीं जानता। हां, काम जानता है। वह भी मुझे लगता है कि पत्रकारिता के ग्लैमर के कारण। किसी बैंक में मैनेजर होता तो शायद ही जान पाता।

ना कोई संवाद, ना कोई विवाद। दफ्तर आना और चुपचाप अपने कमरे में चले जाना। किताबें पढ़ना, टीवी देखना। मेरे कमरे में मेरे दोस्त भी नहीं आते। अगर हमें मिलना होता है तो वह मुझे अपने यहां बुला लेते हैं।

मेरे कमरे से नजदीक नोएडा का सेक्टर 18 पड़ता है जहां हम दोस्त कभी-कभार मिल लेते हैं।

खैर जिसकी कमी खली उसके बारे में बात करूं। घर में तीन भाई-बहनों में सबसे छोटा होने के कारण मुझे थोड़ा ज्यादा ही प्यार मिला है। कल दीदी ने फोन किया तो बताया कि हम लोग फुलोरी खा रहे हैं। तो मैंने कहा यहां तो मैंने एक भी जिनोर नहीं खाया है, तो फुलोरी कहां से मिलेगा?

* फुलौरी: मक्के को पीस कर बनाया जाने वाला मीठा खाद्य पदार्थ
* जिनोर: मक्का, भुट्टा

तो भई यह मेरी पीड़ा। दिल्ली में रिश्तेदारों की बात की जाए तो मेरे एक मौसेरे भाई रहते हैं। भाभी इटावा की हैं। उन्हें फुलौरी के बारे में नहीं पता। उन्हें पता है, चिल्ला, मंगौड़े और पता नहीं क्या-क्या। जो मुझे नहीं पता था।

क्या आप लोगों को इस बारे में कुछ पता है? अगर नहीं पता तो इस लिंक को देखें। इसमें से प्याज, धनिया, नमक वाला आइटम हटा कर केवल चीनी डाल दीजिए फुलौरी तैयार हो जाएगा।

रोलिंग के हाथों में जादू है

जुलाई 21, 2007

मैंने हैरी पाटर के छह किताबें पढ़ी हैं। पहले की चार हिंदी में बाकी के दो अंग्रेजी में। मेरी अंग्रेजी इतनी अच्छी भी नहीं है लेकिन यह जे के रोलिंग के हाथों का जादू है कि मैं उन किताबों को पढ़ पाया।

जिन्होंने भी हैरी पाटर नहीं पढ़ी है उसके बारे में यही कहा जा सकता है कि वो सारे ‘मगलू’ हैं। अगर आप मगलू नहीं जानते तो पढ़े हैरी पाटर सीरीज।

वैसे आज के दिन क्या हिंदी और क्या अंग्रेजी पूरे विश्व में हैरी पाटर छाया हुआ है। आप मजमून देख लीजिए। हमारे टीवी चैनल जिनको बाबा और सांप से फुरसत नहीं मिलती है आज सुबह वह भी पाटर मानिया से अभिभूत दिखे।

Harry Potter in Wikipedia

JK Rowling official website