घड़ी-घड़ी नौटंकी करता है

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यह शोले का मशहूर डायलग है। लेकिन इस साल के 6 महीने बीत जाने के बाद मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के बारे में भी यही कहा जा सकता है। मेट्रो, भेजा फ्राई और चीनी कम को छोड़कर सारी फिल्में नौटंकी की तरह बनी हैं।

अब तक बनी फिल्मों में कई बड़ी बैनर की भी फिल्में है, बड़े चेहरे लेकिन नौटंकी।

वाटर और स्पाइडर मैन को मैं हिन्दी फिल्मों के अंतर्गत नहीं रखता हूं। आने वाले 6 महीने में जो फिल्में देखने लायक होंगी उसमें हैं आशुतोष गोवारीकर की जोधा-अकबर और आमिर खान की कजरी।

4 Responses to “घड़ी-घड़ी नौटंकी करता है”

  1. अनूप शुक्ल Says:

    देखना और बताना कैसी है!

  2. mamta Says:

    आजकल तो जैसे अच्छी फिल्मों का अकाल सा पड़ गया है।

  3. समीर लाल Says:

    चलो, अब जब इन दोनों मूविज की समीक्षा लिखोगे, उस हिसाब से देखेंगे. तब तक यहीं चिट्ठों में जुटे हैं. 🙂

  4. mr takur Says:

    nehi nehi mere jahn , kuch kuch hota hai!im form indonesia, i dont know!

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