भारत में Gay और Lesbian संस्कृति का हमला

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जब मैं यह संस्कृति लिखता हूं इसका मतलब है कि यह हमारे रोज मर्रा की आदतों में शुमार हो रहा है। और यह हमला है या नहीं यह तो आपके देखने का नजरिया बताएगा।

जिनको इस बारे में नहीं पता विकिपिडिया की यह लिंक उनके लिए महत्वपूर्ण है।

आज के फैशन के साथ हर तीसरी फिल्म में गे के बारे में दिखाया जाता है। कोंकणा सेन तो इस खासी परेशान है। पहले पेज थ्री फिर मेट्रो।

मैं शूटआउट एट लोखंडवाला देखने नोएडा के पीवीआर गया था। देखा एक लंबे बालों वाला पुरुष जिसने अपने होठों पर कुछ पहन रखा था। अब उसे कानबाली तो नहीं ही कहेंगे शायद होठबाली भी नहीं। अब यह फैशन की मार है या ..।

नीदरलैंड, बेल्जियम, स्पेन, कनाडा और दक्षिण अफ्रीका में तो एक लिंग के साथ विवाह को कानूनी मान्यता मिल गई है। कई जगहों पर बहस चल रही है। अमेरिका के मैसाच्चुएट्स में भी इसको कानूनी मान्यता मिली है लेकिन पूरे अमेरिका में इसके लिए लड़ाई लड़ी जा रही है।

अब अगर हम थोड़ा संकुचित सोचे तो यह होगा कि बाहर में क्या हो रहा इससे हमे क्या? लेकिन फैशन तो अब इंटरनेट के माध्यम से भी चल रहा है। और मुमकिन है कि आने वाले कुछ सालों में भारत में भी इसके कानूनी रूप के लिए आवाजें उठेंगी।

हमारे पड़ोसी राष्ट्र पाकिस्तान ने तो ऐसी शादियों को अवैध ठहरा दिया है। भारत में ऐसी शादियां आए दिन मीडिया की जुबानी हम सुनते रहते हैं। लेकिन पता नहीं आज की युवा किस दिन यह सीमा तोड़ेगी और कहेगी हमें चाहिए कानूनी हक। समय का इंतजार कीजिए, यह जल्द ही होगा।

2 Responses to “भारत में Gay और Lesbian संस्कृति का हमला”

  1. Vyvee Says:

    I have always taken homosexuality as balance of nature … Nature is trying to balance itself through a right way of giving pleasure and controlling population at the same time.

    It does not matter you are a gay or straight what matters is with how much dignity you carry yourself in either of the relations.

    I could not get what are you trying to project here by writing this article…

  2. rahul Says:

    इसे किसी हमले की तरह मत लीजिए. आपने ख़ुद इसे संस्कृति कहा तो मैं एक बार फिर से याद दिलाना चाहता हू कि यह संस्कृति काफ़ी लंबे समय से भारत मे मौजूद रही है. फ़र्क यही है कि अब इसपर पश्चिम मे बहस होने लगी है तो इसे यहा के लिए नया माना जा रहा है. आप ख़ुद ही सोचिए कि मुहल्ले मे कितनी कहानिया होती थी इस बाबत . शहर मे अभी भी कुछ लोग काफ़ी प्रसिध्द होते हैं . अयोध्या मे तो कई सारे बाबा ऐसे हैं जिनका आशीर्वाद कई सारे छात्र नेता चुनाव लड़ने से पहले लेने जाते हैं और अगर आशीर्वाद लेने की हिम्मत कर गाये तो चुनाव जीत जाते हैं. एक काफ़ी नाम्चीं समाजवादी नेता है , और उनके बारे मे यही बाते अक्सर लोग करते हुए देखे सुने जा सकते हैं. इसका विरोध सबसे पहले भा ज पा वाले ही करते हैं या संघ वाले , तो क्या उनके शौक किसी से अब छुपे रह गये हैं .
    इन सारी बातो से मेरा अभिप्राय बस इतना ही है कि व्यक्ति की दैहिक़ स्वतंत्रता उसकी निजी होती है . इसमे मैं ना तो भाजपा का विरोध कर रहा हू और ना ही संघ का और ना ही समज्वदियोन का . मैं उनकी दैहिक़ स्वतंत्रता का पूरा सम्मान करता हूँ . लेकिन अगर इसे हमला कहे तो यह ग़लत बात होगी. हमला तो बाहर से होता है . यह सारी चीज़ें तो पहले से ही मौजूद हैं.

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