चिट्ठेकार माँ/पिता क्या आपने ध्यान दिया है?

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आज सुबह मेरा भतीजा स्कूल के लिए तैयार हो रहा था तो मैंने देखा कि उसका स्कूल बैग में बहुत कापी किताब हैं। वह दस साल का है। पांचवीं कक्षा में है।

मैंने जब उस बैग को उठाया तो पता चला कि बैग का वजन कुछ पंद्रह किलो के आसपास होगा। स्कूल सीबीएसई मान्यता प्राप्त है। लेकिन कापियां आप बाजार से नहीं खरीद सकते। स्कूल की अपनी कापियां हैं। बड़ी कापियां। स्कूल के लोगो के साथ।

क्या यह सही है। बच्चा परेशान है। मां-पिता का कहना है कि हम क्या कर सकते हैं। यह बैग परशुराम के धनुष की तरह भारी है। बच्चे की पीठ झुकी जा रही है। क्या आपके बच्चे भी इसी तरह स्कूल जा रहे हैं? अगर हां तो कुछ कीजिए। या फिर आप भी साधारण मां-पिता की तरह यही कह रहे हैं कि क्या किया जा सकता है?

5 Responses to “चिट्ठेकार माँ/पिता क्या आपने ध्यान दिया है?”

  1. sanjay bengani Says:

    शायद ही कोई अभिभावक होंगे जो इस समस्या से जुझ नहीं रहे होंगे. सब झुठी मानसिक तसल्ली का खेल है. कम किताबे होंगी तो लगेगा हमारा बच्चा पिछड़ जाएगा. यह असुरक्षा का भाव बच्चो को शारीरिक रूप से कष्ट पहूँचा रहा है. खेलने की उम्र में कूलि बन कर रह गए है.

  2. masijeevi Says:

    चिट्ठेकार मॉं ने भी दिया है और चिट्ठेकार पिता ने भी, जाकर स्‍कूल में लड़े- उन्‍होंपे कहा क्‍या करें आप अभिभावकों को ही लगता है कि खूब सारा पढ़ाया जाना चाहिए…इस बार हार्ड बांउड की जगह साफ्ट बांउंड किताबें दे दी हैं पर असल समस्‍या जो पाठ्क्रम में है उस पर ध्‍यान नहीं दिया।

  3. वि‍ष्णु बैरागी Says:

    बात नई बिलकुल ही नहीं है । परेशान तो सब हैं लेकिन शुरूआत कौन करे ? हर कोई चाहता है कि उसकी लडाई कोई दूसरा लडे । हर कोई, बिना कुछ भी खोए सब कुछ हासिल कर लेना चाहता है । सब के सब समझदार हैं । नादान और अनजान कोई भी नहीं है । सब जानते हैं कि कुछ हासिल करने के लिए कुछ खोना पडता है । लेकिन खोने की शुरूआत कौन करे ? हर कोई ‘सेफ गेम’ खेलना चाहता है । श्री विजय वाते का एक शे’र अर्ज है –

    चाहते हैं सब के बदले ये अंधेरों का निजाम
    लेकिन हमारे घर किसी बागी की पैदाइश न हो

  4. बचपन की कीमत पर आत्मसंतुष्टि Says:

    […] ब्लॉगर पिता होने के नाते राजेशजी की चिंता में मेरे सूर) Share […]

  5. kripal Says:

    jald hi bacche laptop le ke jaya karege kam se kam tumhare to zaroor🙂

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