घर से बहुत दूर हूं, किसी चीज की कमी खली है

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दिल्ली में रहते हुए पांच साल से अधिक हो गए। पिछले दो सालों से अकेले रह रहा हूं। उस पर से यह भाव विहीन शहर। मेरा पड़ोसी मेरा नाम नहीं जानता। हां, काम जानता है। वह भी मुझे लगता है कि पत्रकारिता के ग्लैमर के कारण। किसी बैंक में मैनेजर होता तो शायद ही जान पाता।

ना कोई संवाद, ना कोई विवाद। दफ्तर आना और चुपचाप अपने कमरे में चले जाना। किताबें पढ़ना, टीवी देखना। मेरे कमरे में मेरे दोस्त भी नहीं आते। अगर हमें मिलना होता है तो वह मुझे अपने यहां बुला लेते हैं।

मेरे कमरे से नजदीक नोएडा का सेक्टर 18 पड़ता है जहां हम दोस्त कभी-कभार मिल लेते हैं।

खैर जिसकी कमी खली उसके बारे में बात करूं। घर में तीन भाई-बहनों में सबसे छोटा होने के कारण मुझे थोड़ा ज्यादा ही प्यार मिला है। कल दीदी ने फोन किया तो बताया कि हम लोग फुलोरी खा रहे हैं। तो मैंने कहा यहां तो मैंने एक भी जिनोर नहीं खाया है, तो फुलोरी कहां से मिलेगा?

* फुलौरी: मक्के को पीस कर बनाया जाने वाला मीठा खाद्य पदार्थ
* जिनोर: मक्का, भुट्टा

तो भई यह मेरी पीड़ा। दिल्ली में रिश्तेदारों की बात की जाए तो मेरे एक मौसेरे भाई रहते हैं। भाभी इटावा की हैं। उन्हें फुलौरी के बारे में नहीं पता। उन्हें पता है, चिल्ला, मंगौड़े और पता नहीं क्या-क्या। जो मुझे नहीं पता था।

क्या आप लोगों को इस बारे में कुछ पता है? अगर नहीं पता तो इस लिंक को देखें। इसमें से प्याज, धनिया, नमक वाला आइटम हटा कर केवल चीनी डाल दीजिए फुलौरी तैयार हो जाएगा।

10 Responses to “घर से बहुत दूर हूं, किसी चीज की कमी खली है”

  1. Sanjeet Tripathi Says:

    समझ सकता हूं आपकी भावनाएं, घर से दूर होने का एहसास!!

  2. Amit Says:

    मेरा पड़ोसी मेरा नाम नहीं जानता। हां, काम जानता है। वह भी मुझे लगता है कि पत्रकारिता के ग्लैमर के कारण। किसी बैंक में मैनेजर होता तो शायद ही जान पाता।

    तब भी जानता, लोन वोन लेने की ज़रूरत पड़ जाए कभी इस वास्ते!!😉

  3. bhuvnesh Says:

    एक दिन दोस्तों और पडौ़सियों को खुद भी घर पर बुलाकर धांसू पार्टी दे डालिये… ये अकेलेपन जैसे शब्द दूर भागेंगे.

  4. समीर लाल Says:

    हम आपका दर्द जी रहे हैं, भाई. दो बूंद आंसू हमारे भी जोड़ लो.

  5. Shrish Says:

    आपके दर्द में कुछ हद तक हमारा दर्द भी शामिल कर लीजिए, अपने गाँव जैसी बात यहाँ कहाँ।😦

  6. अनूप् शुक्ल Says:

    भुवनेश की सलाह पर अमल करो!🙂

  7. divyabh Says:

    यह दर्द मुझे भी है जो कचोटता है…मेरे भी दर्द को जोड़ कर पार्टी दे ही डालो…। 🙂

  8. जोगलिखी संजय पटेल की Says:

    भाई आपके दर्द में शरीक हूं.इन्दौर में रहता हूं ..कभी इसे बम्बई का बच्चा कहा जाता था ..अब ये अपने मासूम बचपन को छोड़ कर जैसे ही युवा होने लगा है..चार पहिया गाडि़यों के रेले,ट्रेफ़िक जाम,प्रदूषण और पड़ौसियों से अबोले,सामान्या बात बनते जा रहे हैं..कस्बे से नगर और नगर से महानगर बनता मेरा प्यारा शहर अपनी डगर से हटता जा रहा है.एक इतना बड़ा तबका माइग्रेट कर रोज़ी रोटी की तलाश में यहाँ चला आया है.क्या आप यक़ीन करेंगे कि पिछले दिनो एक मार्ग को चौड़ा करने के चक्कर में (इसे कुचक्र कहना बेह्तर होगा)चार सौ से ज़्यादा पॆड़ (वे भी सत्तर से सौ साल उम्र के ) काट डाले…मनुष्य की ये हरक़तें ही उसे तनहा बना रही है….ख़राबियाँ परिवेश से शुरू होती हैं …परिवार को ख़राब करती हैं और फ़िर लहुलुहान हो जाता है समाज…आपका अकेलापन समाज के अकेलेपन और रूखेपन की तस्वीर पेश करता है.

  9. paramjitbali Says:

    जिनोर ना ्खा पाने की पीड़ा सच मे बहुत पीड़ा देती है।हमे भी अपने ्दुख मे शामिल समझे।

  10. umesh singh Says:

    hi mey umesh singh from kolkata

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