Archive for the ‘Chating’ Category

भारतीयों में आइडेंटिटी क्राइसिस सबसे ज्यादा!!

अगस्त 19, 2007

Posters

एक बड़े नेता ने भाषण दिया तो अखबार में साथ में उपस्थित होने वालों का पूरा ब्यौरा पूरी रिपोर्ट से बड़ी होती है।

अपने परिचय को लेकर सबसे ज्यादा सांसत में हम भारतीय ही दिखते हैं। मैं फलां हूं। लोगों को यह अहसास कराना कि हम भी कुछ हैं। इस कारण ही कई गलत हो जाते हैं।

यह ख्याल मेरे जेहन में आज सुबह एक पोस्टर देखने के बाद हुई। दिल्ली के त्रिलोकपुरी से शंकर भाटी को बसपा के युवा अध्यक्ष बनाए गए(अंदाजा लगाइए कितनी बड़ी खबर है) पूरा का पूरा इलाका पोस्टरों से भरा है। साथ में बड़े-बड़े बोर्ड और होर्डिग। भाटी जी की तस्वीर सबसे बड़ी होती है और साथ ही छोटी-छोटी तस्वीर मायावती, सतीश मिश्रा और कांशी राम की।

क्या गजब देश है? और क्या गजब के लोग?

क्या आप अजातशत्रु बन पाएंगे?

अगस्त 18, 2007

लोग कहते हैं ना चाहने से क्या नहीं होता है! सब कुछ हो जाता है! क्या सच में सब कुछ हो सकता है? क्या आप जीते जिंदगी अजातशत्रु बन सकते हैं। अजातशत्रु। वो जिसका कोई शत्रु ना हो।

आत्मविश्वास और धैर्य उसकी दो सबसे बड़ी पूंजी है। वह घड़ी के समान है। जो हमेशा चलती रहती है। उसका गुण धीरे-धीरे निखर कर आता है। पांच या दस मिनट में वह किसी को प्रभावित नहीं करता है। और ना ही पांच या दस दिनों में। उसका असली गुण आपके सामने कुछ महीनों में आपको दिखता है।

मेरा एक दोस्त है। उम्र यही कोई 27-28 होगी। वह भी पत्रकार है। जितना मैं उसके बारे में जानता हूं, उसके मुताबिक वह जीते जिंदगी अजातशत्रु बना हुआ है। मेरे जैसे कई दोस्त हैं उसके। यूं कहिए लंबी फेहरिस्त है। लेकिन कोई उसका शत्रु नहीं है। कोई उसका बुरा नहीं चाहता। कोई उससे ईष्र्या नहीं करता। गजब है वो। उसके लिए मैं हमेशा एक बात लोगों को बोलता, बहुत ही सरल है वो।

सिंपली आउटस्टैंडिंग। बहुत आगे जाएगा मेरा यह दोस्त सिद्धार्थ।

सठियाना किसे कहते हैं, इसे पढ़िये

अगस्त 11, 2007

सच्ची घटना पर आधारित। आप बीती सुना रहा हूं। कोई मजाक ना समझे। यह समझ लें कि जब आप बुढ़ा जाएं तो ऐसा कुछ भी ना करें। नहीं तो कोई आपके बारे में भी कोई कुछ कहेगा या लिख देगा।

मुझे थोड़ी जल्दी थी। दफ्तर से बिना पूछे अपने काम से निकला था। काम पूरा कर फिर दफ्तर भी लौटना था। मुझे जरूरत थी अपने आई कार्ड के फोटो कापी की। दुकान पर गया तो देखा एक बुजुर्ग रौकिंग चेयर पर आराम फरमा रहे थे। हाथ में पका हुआ भुट्टा। यूं कहिए कि बस मजे ले रहे थे। मैंने कहा कि फोटो कापी कराना है। उन्होंने पूछा क्या है? मैंने आई कार्ड दिखाया.. उन्होंने इशारा करते हुए बताया कि आगे दुकान है, वहां से करा लो, मैं नहीं कर पाऊंगा।

मुझे जल्दी तो थी ही, मैंने निवेदन किया। उत्तर में उन्होंने कहा कि आगे चले जाओ वहां हो जाएगा।

मैं आगे चला गया। वहां की फोटो कापी मशीन खराब थी। वापस लौटा। पुन: उसी दुकान पर। मैंने कहा कि मुझे इसकी जरूरत है। प्लीज कर दीजिए। उन्होंने कहा मैं एक-दो कापी नहीं करता हूं। आगे एक और मार्केट है, वहां चले जाओ हो जाएगा। मैंने कहा कि एक नहीं दस कर दीजिए लेकिन कर दीजिए।

बुजुर्ग ने कहा, जब जरूरत एक की है तो दस क्यों? मैंने कहा एक और दस ज्यादा मतलब है कि मुझे जरूरत और जल्दी दोनो है। उसने फिर मुझे कहा कि आगे वाली मार्केट में चला जाऊं। मैंने कहा आप दस के पैसे ले लीजिए।

अब बुजुर्ग कहता है कि एक मैं करता नहीं हूं। दस करूंगा तो कहोगे कि पैसे का भूखा है। मुझे पैसे कमाने का शौक नहीं है। आगे चले जाओ वहां से करा लो।

क्या बुजुर्ग(बुड्ढा) सठिया हुआ नहीं था?

आह! ये इंटरनेट ‘यारी’ से परेशान हो गया हूं

अगस्त 3, 2007

ऐसा लगता है जैसे ‘यारी’ की बाढ़ आ गई है। पिछले सात दिनों में मुझे ‘यारी’ सोशल नेटवर्किग साइट की ओर से कुल 23 लोगों ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया। मैं आकरुट पर रजिस्टर हूं। वहां से मुझे एक सीख मिली। सोशल नेटवर्किग साइट्स से जितना फायदा नहीं है उससे कहीं ज्यादा घाटा मुझे दिखता है।

आकरुट को मैं कॉपी-पेस्ट की दुनिया कहता हूं। यहां एक की कापी मारकर दूसरे को चिपका दिया जाता है। यारी से पहले ‘टैग्गड’ ने भी मुझे परेशान किया था। मुमकिन है आप लोगों को भी..।

यह इंटरनेट की दुनिया है यारों, जरा बच के। इस दुनिया की खास बात यह है कि यहां अच्छी चीजें कम, बुरी चीजें ज्यादा मिलती हैं। आपको संभल कर अच्छी चीजों को उठाना होगा। भीड़ को देखकर आप भी उनके साथ ना हो लें।

आह! ये इंटरनेट ‘यारी’ से परेशान हो गया हूं

अगस्त 3, 2007

ऐसा लगता है जैसे ‘यारी’ की बाढ़ आ गई है। पिछले सात दिनों में मुझे ‘यारी’ सोशल नेटवर्किग साइट की ओर से कुल 23 लोगों ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया। मैं आकरुट पर रजिस्टर हूं। वहां से मुझे एक सीख मिली। सोशल नेटवर्किग साइट्स से जितना फायदा नहीं है उससे कहीं ज्यादा घाटा मुझे दिखता है।

आकरुट को मैं कॉपी-पेस्ट की दुनिया कहता हूं। यहां एक की कापी मारकर दूसरे को चिपका दिया जाता है। यारी से पहले ‘टैग्गड’ ने भी मुझे परेशान किया था। मुमकिन है आप लोगों को भी..।

यह इंटरनेट की दुनिया है यारों, जरा बच के। इस दुनिया की खास बात यह है कि यहां अच्छी चीजें कम, बुरी चीजें ज्यादा मिलती हैं। आपको संभल कर अच्छी चीजों को उठाना होगा। भीड़ को देखकर आप भी उनके साथ ना हो लें।

आईएएस और आईएएस का मक्का मुखर्जी नगर-2

जुलाई 30, 2007

शाम का समय। सरकार के एसबीआई बैंक से लेकर के वी कामथ के आईसीआईसीआई बैंक के एटीएम में कतारबद्ध लड़के-लड़कियां। आलू, चावल, दाल के लिए पैसे निकालते हुए।

आज के आईएएस की तैयारी करने वाले छात्र मितव्ययी तो एकदम नहीं होते। सिगरेट और चाय में इनके सबसे ज्यादा पैसे खर्च होते हैं।

दिल्ली आने के बाद इनको जो सबसे ज्यादा दिक्कत होती है वह है एड्रेस प्रूव की। इनका कोई निश्चित ठिकाना तो होता नहीं है। आज यहां हैं तो कल कहीं और। वैसे एड्रेस प्रूव की जरूरत इन्हें दो मौकों पर ज्यादा होती है। सिम कार्ड या फिर बैंक खाता खुलवाने के वक्त। वैसे यह दिक्कत हर शहर में हर नए शख्स को होती है।

इन होनहारों की एक और खास बात होती है यह सफाई खुद से नहीं करते हैं। इन्हें 300 रुपये प्रतिमाह में कूक और 50 रुपये प्रतिमाह में कूड़ा उठाने वाला/वाली बड़े आसानी से मिल जाती है। दिल्ली में सकरुलेशन को लेकर लड़ने वाले दो बड़े अखबार इनकी पसंद नहीं होते। इनके ‘द हिंदू’ आता है। वह अलग की बात है कि उसे भी यह पढ़ते कम ही हैं। प्रतियोगिता दर्पण यहां की हाट मैगजीन है।

अगर इन इलाकों में सबसे ज्यादा कोई परेशान है तो वह हैं मकान मालिक। इनका दर्द कोई नहीं सुनता। कम से कम यह छात्र तो एकदम नहीं। 100 में से 70 मकानों में छात्र की जमघट लगी ही रहती है। आप किसी परिचित छात्र के यहां जाने पर आपका दोस्त कम से कम अपने पांच दोस्तों से आपका परिचय कराता है।

इनकी बातें एक आम जागरूक इंसान के लिए हमेशा मजेदार होतीं हैं। इतिहास के गर्भ से कभी भी आपको ये कोई हीरा तो कभी कोई पत्थर के बारे में बता सकते हैं। हिंदी की बात चलेगी तो बीच-बीच में अज्ञेय, नागाजरुन, प्रेमचंद, दिनकर, महादेवी की पंक्तियां आपको लुभाएंगी। इनके पास बताने को बहुत कुछ होता है। समाज के जोड़-तोड़ के बारे में, इसकी संरचना, जातिगत व्यव्स्था के बारे में समाजशास्त्र वैकल्पिक विषय रखने वाला छात्र आपको बहुत कुछ बता जाएगा।

और भी बहुत कुछ..बाद में

दिल्ली की एक खास और अजीब बात

जुलाई 29, 2007

एक खास जिनके बारे में लोगों को पता होगा लेकिन लिखा नहीं गया। दिल्ली के खाने के बारे में कतई नहीं लिखूंगा। इस पर ब्लाग तो छोड़िए मोटी-मोटी किताबें लिखी जा चुकी हैं।

दिल्ली में एक फैशन पुरजोर है। हर बड़े शब्द को छोटा कर दीजिए। जिसे कहते हैं, शार्ट फार्म या एब्रीवियेशन। दिल्ली में चलने वाले कुछ पुराने शार्ट फार्म। आईटीओ, डीयू, जीके, साउथ एक्स, सीआर पार्क और भी कई हैं।

कुछ नए शाट फार्म। क्या आप इनके लांग फार्म जानते हैं? इंस्टी, सीसीडी, एनडी..। डीयू के तकरीबन हर कालेज को शार्ट फार्म ही लोग बोलते हैं। एलएसआर, एसआरसीसी, एमएच, सीएलसी, आईपी..।

कुछ न्यूज पेपर। टीओआई, ईटी, एचटी, एफई..।

और इसको बढ़ावा दे रहे हैं यहां के लोग, जो यहां के हैं नहीं। क्योंकि दिल्ली एक कोस्मोपोलिटन शहर है।

कुछ आपको पता हो तो आप इस लिस्ट को बढ़ा सकते हैं।

आईएएस और आईएएस का मक्का मुखर्जी नगर

जुलाई 29, 2007

अगर आपने आट्र्स की पढ़ाई की होगी या कर रहें होंगे तो आप भी आईएएस की तैयारी के बारे में सोचते होंगे। आपका जवाब नहीं है! मुझे सहज रूप से विश्वास नहीं हो रहा। मैं आपसे कहूंगा कि ईमानदारी से जवाब दें। हम भारतीय किसी बात का जवाब थोड़ा कम ईमानदारी से देते हैं।

और अगर आप इतिहास के विद्यार्थी रहे होंगे तो आप..।

मैं बुधवार को मुखर्जी नगर गया था। आईएएस का मक्का कहूं तो शायद कुछ गलत नहीं होगा। इसके दो-तीन किलोमीटर के एरिया में आट्रम लाईन, हकीकत नगर, परमानंद, नेहरू विहार, ढका गांव व अन्य कुछ छोटे जगह शामिल है।

छोटे-छोटे दर्जनों संस्थान से घिरा बत्तरा सिनेमा यहां के होनहारों के लिए शाम को चाय की चुस्की लेने का सबसे पसंदीदा स्पाट है। दो रुपये की चाय, ढाई रुपये की सिगरेट और तीस मिनट दोस्तों से बातचीत। यह शाम का माहौल है।

जागृति, लक्ष्य, दृष्टि, श्योर शाट, क्षितिज, केंद्र और ना जाने ऐसे ही कई प्रेरित करने वाले शब्दों से भरा है। यहां का पूरा आर्थिक बाजार इन विद्याथियों के सहारे ही चलता है। अक्टूबर में यहां मंदी आ जाती है। मेंस के बाद बहुत सारे विद्यार्थी अपने घर चले जाते हैं।

इन सबके साथ यहां के कुछ पार्को में आप उन जोड़ों को देख सकते हैं, जो पढ़ाई के साथ प्यार की पींगे भी बढ़ाते हैं। मेरे लिए वो भी वुड बी आईएएस की तरह हैं। कौन जाने प्यार की तरह वह अपने पढ़ाई पर भी पूरा केंद्रित कर लेते हों।

मेरे एक दोस्त ने बताया कि आज-कल में उनका प्री का रिजल्ट आने वाला है। उन सभी विद्यार्थियों को जिन्होंने आईएएस बनने को अपना सपना चुना है, उन्हें सलाम। क्योंकि मैं उतना हिम्मतवाला कभी नहीं बन सका।

Mukharjee Nagar in Wikimapia

क्या नहीं करना चाहिए

जुलाई 24, 2007

अगर आपको यह पता है कि आपको क्या करना चाहिए तो सच मानिए आप अच्छे हैं। लेकिन अगर आपको यह भी पता है कि आपको क्या नहीं करना चाहिए तो फिर आप ग्रेट हैं। इन सबके उलट अगर आपको यह पता है कि क्या करना चाहिए लेकिन यह नहीं पता कि क्या नहीं करना चाहिए तो मुमकिन है कि आप..।

नजीर पेश करता हूं। मेरे एक दोस्त को शेरो-शायरी का शौक चढ़ा। धीरे-धीरे इस शौक के कारण उसे उर्दू सीखने की ललक जगी। उसने एक लुगत खरीदी और उससे कुछ शब्द अपनी डायरी में नोट करने लगा। करता करता परेशान हो गया। उसे उर्दू तो ना आई सारे दोस्त उसका मजाक उड़ाने लगा।

मेरे दोस्त को यह तो पता था कि उसे उर्दू सीखनी है। भाषा का ज्ञान होना तो बड़ी अच्छी बात है लेकिन उसके लिए उसे क्या नहीं करना चाहिए, उसे नहीं पता था। मेहनत में उसने कोई कमी नहीं की लेकिन गलत दिशा में।

स्टाक एक्सचेंज और अच्छी पत्रकारिता का संबंध

जुलाई 23, 2007

रामनाथ गोयनका पत्रकारिता सम्मान में 24 उत्कृष्ट पत्रकारों को सम्मानित किया गया है। इनमें से कुछ को तो हम पहचानते ही हैं। बाकियों को कुछ जानते होंगे।

कल रात एनडीटीवी पर उस दौरान हुई बहस को देख रहा था। क्या अच्छी पत्रकारिता बुरा व्यवसाय है?

वैसे इसके बीच में बता दूं कि आजकल मैं शेयर मार्केट में खरीद-फरोख्त भी कर रहा हूं। वहीं से जोड़ कर यह विचार आया जिसे मैं यहां लिख रहा हूं।

आज भारत के हिंदी चैनलों पर भूत, सांप, बाबा, औघड़, हाथी आपको खूब मिल जाएंगे। और इनसे तथाकथित खुशी मनाने वाली टीआरपी भी मिल जाती है। यह खबरें नहीं होती हैं वरण टीआरपी का फंडा होता है।

ठीक इसी तरीके से शेयर बाजार में अगर कोई चलताऊ शेयर ले ले और उसे कुछ मुनाफा हो जाए तो उसे यह कतई नहीं समझना चाहिए कि ऐसे स्टाक्स अच्छे होते हैं। आज मिल रहे हैं, कल डूब भी सकते हैं।

लेकिन यदि आप ब्लू चिप्स खरीदते हैं तो आपका पैसा डूबेगा नहीं। भले आप उसे आल टाईम हाई में ही क्यों ना खरीद रहें हों। भारतीय बाजार में अभी अति संभावना है।

अब इसी को हिंदी पत्रकारिता से जोड़ दें। हमेशा ‘ब्लू चिप’ रिपोर्ट बनाने चाहिए इसमें आपको मुनाफा मिल कर ही रहेगा। आज नहीं तो कल। और इसी कारण गोयनका पुरस्कार पाने वालों में सारे ऐसे नाम थे जिन्होंने ‘ब्लू चिप’ रिपोर्ट बनाई थीं।

यह केवल पत्रकारिता और शेयर बाजार के लिए नहीं बल्कि इसे हम आप आम जिंदगी में भी इस्तेमाल कर सकते हैं।