Archive for the ‘Law’ Category

चिट्ठा चोर या ‘भूखा’ चिट्ठेकार

अगस्त 20, 2007

देखने का नजरिया अलग है। किसी ने अगर आलोक पुराणिक जी के चिट्ठे से दो पोस्ट हू बहू कापी कर अपने चिट्ठे में डाल दिया तो क्या वह चोर हो गया? आप कहते होंगे, मैं उसे नहीं मानता। मैं उसे उसकी भूख मानता हूं।

आइडेंटिटी क्राइसिस की भूख। वह अच्छा लिखना नहीं जानता। क्रिएटिविटि नहीं है उसके पास। तो क्या करे! हम आप जो लिखते हैं उसका विचार हम अपने आस पास से लेते हैं। कोई कहीं के लिखे हुए एक लाईन से ही पूरी पोस्ट लिख देता है। कोई कुछ करता है तो कोई कुछ।

अभी कुछ दिन पहले मुझे एक चिट्ठेकार ने एक लिंक देकर यह बताया गया कि इस चिट्ठेकार ने कईयों की पोस्ट को अपने नाम से पब्लिश कर दी है। मैंने कहा यह तो बड़ी अच्छी बात है। मुफ्त में प्रचार हो रहा है। हां, वो अलग बात है कि आपका नाम नहीं दिया गया है। कोई बात नहीं। आपको पढ़ने वाले आपकी लेखनी को जानते हैं। नाहक आप परेशान ना होईए।

उन्होंने कहा कि यह तो गलत बात है कि बिना नाम दिए उसने यह सब काम कर दिया। मैंने कहा गलत तो है लेकिन आप कुछ कर नहीं सकते। और करना भी नहीं चाहिए। तब तक जब तक वह आपका प्रतियोगी ना बन जाए।

आपका लिखा हुआ पोस्ट अगर कोई दूसरा पब्लिश करता है तो वह बेचारा ‘भूखा’ है। आपने उसे खाना दिया है। ठीक है कि वह आपका नाम नहीं ले रहा है, लेकिन दिया आपने ही है। जिसे सब लोग जानते हैं।

इसलिए शोर मत मचाइए, भूखे को खाना देना पुण्य की बात है। खुश हो जाइए। इसमें आपका कोई नुकसान नहीं हो रहा है।

नोट: (आलोक पुराणिक जी का नाम मात्र उदाहरण के लिए दिया गया है)

चिट्ठा चोर या ‘भूखा’ चिट्ठेकार

अगस्त 20, 2007

देखने का नजरिया अलग है। किसी ने अगर आलोक पुराणिक जी के चिट्ठे से दो पोस्ट हू बहू कापी कर अपने चिट्ठे में डाल दिया तो क्या वह चोर हो गया? आप कहते होंगे, मैं उसे नहीं मानता। मैं उसे उसकी भूख मानता हूं।

आइडेंटिटी क्राइसिस की भूख। वह अच्छा लिखना नहीं जानता। क्रिएटिविटि नहीं है उसके पास। तो क्या करे! हम आप जो लिखते हैं उसका विचार हम अपने आस पास से लेते हैं। कोई कहीं के लिखे हुए एक लाईन से ही पूरी पोस्ट लिख देता है। कोई कुछ करता है तो कोई कुछ।

अभी कुछ दिन पहले मुझे एक चिट्ठेकार ने एक लिंक देकर यह बताया गया कि इस चिट्ठेकार ने कईयों की पोस्ट को अपने नाम से पब्लिश कर दी है। मैंने कहा यह तो बड़ी अच्छी बात है। मुफ्त में प्रचार हो रहा है। हां, वो अलग बात है कि आपका नाम नहीं दिया गया है। कोई बात नहीं। आपको पढ़ने वाले आपकी लेखनी को जानते हैं। नाहक आप परेशान ना होईए।

उन्होंने कहा कि यह तो गलत बात है कि बिना नाम दिए उसने यह सब काम कर दिया। मैंने कहा गलत तो है लेकिन आप कुछ कर नहीं सकते। और करना भी नहीं चाहिए। तब तक जब तक वह आपका प्रतियोगी ना बन जाए।

आपका लिखा हुआ पोस्ट अगर कोई दूसरा पब्लिश करता है तो वह बेचारा ‘भूखा’ है। आपने उसे खाना दिया है। ठीक है कि वह आपका नाम नहीं ले रहा है, लेकिन दिया आपने ही है। जिसे सब लोग जानते हैं।

इसलिए शोर मत मचाइए, भूखे को खाना देना पुण्य की बात है। खुश हो जाइए। इसमें आपका कोई नुकसान नहीं हो रहा है।

नोट: (आलोक पुराणिक जी का नाम मात्र उदाहरण के लिए दिया गया है)

मुफ्त मिलने वाली चीजें मुफ्त नहीं मिलती

जुलाई 25, 2007

भारत की अजीब बनावट का ही कमाल है कि यहां मुफ्त में मिलने वाली चीजें मुफ्त नहीं मिलती हैं। एफआईआर कराने के लिए पैसे देने पड़ते हैं। कोई जरूरी नहीं कि पैसे देने के बाद भी आपकी एफआईआर लिख ली जाए।

हम आप सभी के साथ ऐसा हुआ होगा। सरकारी काम कराने के लिए आपको बख्शीश देनी होती है। यह बख्शीश नहीं घूस होती है। ब्राइब। पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस, राशन कार्ड। आपको अधिकारी से लेकर पुलिस वाले को पैसा देना ही पड़ता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कल अपने एक आदेश में कहा है कि राज्य यह सुनिश्चित करे कि लोगों के एफआईआर लिखे जाए। रविवार रात दिलवालों की नगरी दिल्ली में कुछ 40-50 लड़कों की टोली ने उत्पात मचाया, जिसका कोई एफआईआर नहीं लिखा गया। यह है दिल्ली पुलिस, विथ यू, फार यू, आलवेज।

सुप्रीम कोर्ट के जज बीएन अग्रवाल ने अपना अनुभव बताया। कहा मेरी पत्नी और बेटी किसी मामले में पुलिस स्टेशन एफआईआर लिखाने गए थे जिसे लिखने में दो-तीन घंटे का समय लग गया। अगर सुप्रीम कोर्ट के जज साथ ऐसा हो सकता है तो आप अनुमान लगा सकते हैं।

आरटीआई इसका इलाज है। लोग आरटीआई को ही नहीं जानते।

क्या आप भी नही जानते ?

आईडेंटिटी क्राइसिस: राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों से एक मुलाकात

जुलाई 2, 2007

स्कूल में सबको पढ़ाया बताया जाता रहा कि बड़ा सपना देखो, बड़े बनोगे। लेकिन सुनता ही कोई नहीं। मैं सुनता था सो मैंने मेरा सपना नाम से ब्लाग बना लिया और जो मुझसे भी बड़ा सपना देखते थे उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव के लिए नामांकन भर दिया। एक नजर..

वकील, दर्जी, बढ़ई, बीमा एजेंट सब के सब लगे पड़े हैं राष्ट्रपति बनने के लिए। अपनी कमाई का 15 हजार भी उन्होंने नामांकन शुल्क भी भर दिया है। कोई भ्रष्टाचार दूर करने के लिए राष्ट्रपति बनना चाहता है तो कोई अफजल को फांसी देने के लिए।

दिल्ली के एक सज्जन हैं तीन बार स्नातकोत्तर कर चुके हैं। एलएलबी की भी डिग्री है। कांग्रेस और भाजपा दोनों को पूंजीवादी पार्टी मानते हैं। पिछली बार इनका नामांकन वैध नहीं पाया गया था और इस बार भी नामांकन वैध नहीं पाया गया है।

राष्ट्रपति बनने के लिए 84 लोगों ने नामांकन भरा था लेकिन अफसोस 82 लोगों के नामांकन वैध नहीं पाये जाने से रद्द कर दिया गया है। क्या यह सारे लोग सनकी हैं। पता नहीं शायद ऊंचा ख्वाब और अपनी पहचान के लिए तरसते हैं। इनको पहचान चाहिए। आईटेंटिटी क्राइसिस।

आरटीआई से सबकी फटी पड़ी है

जुलाई 2, 2007

बच्चे पिता से क्यों डरते हैं? मुझे इसका सीधा जवाब जो समझ में आता है वो है कि पिता बेटे से कुछ भी प्रश्न कर सकता है। कुछ भी।

पत्रकारों से पुलिस क्यों सहमे रहते हैं? सीधा जवाब पत्रकार पुलिस वालों से सवाल पूछने का हक रखते हैं।

इस सवाल पूछने के हक ने ही आम आदमियों को इतना मजबूत बना दिया है कि इसके कारण प्रधानमंत्री कार्यालय, सुप्रीम कोर्ट और संघ लोक सेवा आयोग जैसे कार्यालय इनसे सहमे हुए हैं। आम आदमी की भाषा में कहूं तो इनकी फटी पड़ी है।

आरटीआई, राइट टू इंफोरमेशन, सूचना का अधिकार। आज मैं एक खबर बना रहा था, यह वाली। इस डाक्टर को आरटीआई की ताकत का अंदाजा तो था लेकिन कुछ हो जाएगा शायद इसका अहसास नहीं था। अहसास हो गया।

आप भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए इसका जरूर इस्तेमाल कर सकते हैं। कर सकते हैं नहीं कीजिए। आपका भारत बदलेगा और जरूर बदलेगा।

सावधान! कापीराइट, पेटेंट और आईपीआर से भूचाल आएगा

जून 20, 2007

लोगों की बौखलाहट बढ़ेगी और यह तब तक बढ़ेगी जब तक इसे समझ नहीं लिया जाएगा। विदेशों में लोग इसके प्रति जागरूक हो रहे हैं या यू कहें हो चुके हैं। लेकिन हम भारतीयों की स्थिति इन मामलों में थोड़ी गंभीर है।

कापीराइट, ट्रेड मार्क, पेटेंट। अगर आपका काम रचानात्मक है, मसलन लिखना, पढ़ाना, पेंटिग, गाना गाना तो फिर आप को इनकी समझ जरूर होनी चाहिए। पता चला कल को आप चिल्ला रहे हैं कि यह मेरा है लेकिन कुछ कर नहीं पाएंगे। मतलब कि कोर्ट में केस हार जाएंगे।

आप लोगों ने सुना ही होगा बासमती चावल, करेला, हल्दी, योग के कई आसन अमेरिका में पेटेंट हो रहे हैं मतलब साफ है इन सब चीजों का कोई अब व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं कर पाएगा।

गाने की कापीराइट के बारे में आप जानते हैं या नहीं मुझे नहीं पता लेकिन अगर आप अपने जन्मदिन की पार्टी में घर पर ही 50 लोगों के सामने ‘आई एम ए डिस्को डांसर’ बजा रहे हैं तो एचएमवी वाले आप पर केस कर सकते हैं। यह गाना उन्होंने कापीराइट करा रखी है। कंपनी ने केवल कैसेट, सीडी, डीवीडी आपको अपने सुनने के लिए बेची है ना कि पूरे मोहल्ले को सुनाने को। सो सावधान! जानकारी बढ़ाइये

ज्यादा जानकारी के लिए वीकिपीडिया की यह लिंक देख लीजिए।

बाल मजदूरी: भयावह भविष्य, कुछ चित्र

जून 13, 2007

कुछ दिन पहले मैंने एक पोस्ट लिखी थी, क्या आपने कभी 1098 पर फोन किया है? अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन हर साल के 12 जून को श्रम विरोधी दिवस के रूप मनाती है।

हमारे देश में भी सरकार ने अगस्त 2006 में बाल मजदूरी को गैरकानूनी करार दिया है।

किसी ने कहा है कि किसी देश को बरबाद करना है तो वहां के युवा और बच्चों को बरबाद कर दो। तो यह हमारे देश की भयावह तस्वीर..

यह कार्टून बताता है कि हम ही नहीं चाहते कि बाल मजदूरी हटे वरण हम इससे खुश होते हैं।

 cartton as fact

दो बहनें पापकार्न बनाती और बेचती हुई

child labour sisters 

यह मुंबई के 11 साल के लड़के की तस्वीर है जो 80 रुपये के सामान की चोरी में पकड़ा गया, जिसे पुलिस ने बहुत मारा है।

child theft

अफसोस, क्या होगा इस देश का..।
और अंत में झारखंड से निकलने वाले अखबार प्रभात खबर के हजारीबाग संस्सकरण से ली गई एक क्लीपिंग।

child labour

इन सब के अलावा बीबीसी कि बाल श्रम पर कुछ रिपोर्ट

‘परवीन तू है बड़ी नमकीन’: पाक का एक विवादित गाना

मई 23, 2007

भाई मैंने गाना सुना है, बड़ा मस्त गाना है। लेकिन परवीन को कहना भी अपनी जगह सही है। अबरारुल हक का कहना भी अपनी जगह सही है। खैर बात अब पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट में है। यूट्यूब के इस विडियो में को देख कर भी समझ जाएंगे कि विवाद आखिर कैसे उठा। आपके पास अगर स्पीकर/ईयर फोन हो तो गाना सुनिए और मस्त रहिए।

इसपर बीबीसी की यह रिपोर्ट

‘परवीन तू है बड़ी नमकीन’: पाक का एक विवादित गाना

मई 23, 2007

भाई मैंने गाना सुना है, बड़ा मस्त गाना है। लेकिन परवीन को कहना भी अपनी जगह सही है। अबरारुल हक का कहना भी अपनी जगह सही है। खैर बात अब पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट में है। यूट्यूब के इस विडियो में को देख कर भी समझ जाएंगे कि विवाद आखिर कैसे उठा। आपके पास अगर स्पीकर/ईयर फोन हो तो गाना सुनिए और मस्त रहिए।

इसपर बीबीसी की यह रिपोर्ट

वजीर्निया हत्याकांड व अर्थशास्त्र

अप्रैल 17, 2007

देश तरक्की कर रहा है। और करेगा। लेकिन इसके साथ ऐसी घटनाएं होती रहेंगी। लोग पैसा और नाम के पीछे अंधी दौड़ लगा रहे हैं। दूसरा पहले से आगे निकलना चाहता है। पता नहीं कौन-कौन से तरीके लोग अपना रहे हैं। सोमवार को वजीर्निया में कोरियन मूल के एक लड़के ने पहले 33 लोगों की जान ले ली।

1999 के आंकड़ों के अनुसार कुल 21 करोड़ लोगों के पास अपनी बंदूक थी। आज अमेरिका की जनसंख्या तीस करोड़ पंद्रह लाख से कुछ ज्यादा है। अमेरिकी कानून के मुताबिक अगर आप वोट दे सकते हैं तो आप बंदूक भी खरीद सकते हैं।
मैंने इंटरनेट में हथियारों से हुई आय को ढूंढना चाहा लेकिन मिला नहीं। खैर यह कारोबार अमेरिका में अरबों में होगा।

बात करते हैं वजीर्निया हत्याकांड की तो मैं यह बता दूं कि जिस छात्र पर इसका आरोप लगा है उसके नाम के डोमेन को अमेरिका के ही किसी शख्स ने बुक करा लिया है। यह बात दीगर है कि उसका उपयोग वह वजीर्निया एकेडेमी के लिए ही कर रहा है।

यह है वजीर्निया हत्याकांड का अर्थशास्त्र