Archive for the ‘Life’ Category

विश्वास कीजिये अंधविश्वास नही; तहलका के स्टिंग के मुतालिक

अक्टूबर 26, 2007

सभी की अपनी अलग विचारधारा होती है. मुमकिन है पुत्र के विचार पिता से न मिले और ये भी देखा गया है की पुत्र पिता का अंधभक्त होता है. सबके अपने विचार हैं और वही उनकी विचारधारा बनाती है. तहलका ने एक स्टिंग ऑपरेशन किया; ऑपरेशन कलंक. अभी ये आया ही था की मेरे ऑफिस के मेरे सहयोगियों के तरफ़ से कई सारी प्रतिक्रियाये आने लगी. अब ये हो जाएगा, अब वो हो जाएगा. कुछ के शब्द दूसरो के शब्दों से टकराने लगे. माहौल गर्म हो रहा था.  ब्लोग्गिंग में भी यही हो रहा है. एक के पोस्ट दूसरे के पोस्ट से टकरा रहे हैं, तो कही कमेंट से कमेंट.

मुद्दे की बात यह है की आप आंखो देखी पर विश्वास कीजिये. किसी भी चीज पर अंधविश्वास मत कीजिये. अन्धविश्वास वो करते हैं जो पढे लिखे नही होते हैं. और माशाल्लाहा हम लोग तो पढे लिखे लोग हैं. बाकि आप लोग बेहतर समझ सकते हैं. ये राजनीति के दावपेंच हैं या अगर आप अंधविश्वास करेंगे तो किसी दिन आप उसमे ख़ुद फंस सकते हैं.
Democracy is a daily excercise. लोकतंत्र को बनने में हर रोज मेहनत करनी पड़ती है

indian flag enblem

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बच गए हमलोग!!!

अगस्त 21, 2007

सूर्य का जीवन जीने के लिए होना बहुत जरूरी है। इसके बगैर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। एवरेस्ट में चढ़ना काफी मुश्किल है। आदमी एवेरस्ट पर चढ़ गया। वहां से टनों कचरा मिल रहा है। शायद प्रकृति ने इसलिए सूर्य को आदमी की पहुंच से दूर बनाया है।

भारतीयों में आइडेंटिटी क्राइसिस सबसे ज्यादा!!

अगस्त 19, 2007

Posters

एक बड़े नेता ने भाषण दिया तो अखबार में साथ में उपस्थित होने वालों का पूरा ब्यौरा पूरी रिपोर्ट से बड़ी होती है।

अपने परिचय को लेकर सबसे ज्यादा सांसत में हम भारतीय ही दिखते हैं। मैं फलां हूं। लोगों को यह अहसास कराना कि हम भी कुछ हैं। इस कारण ही कई गलत हो जाते हैं।

यह ख्याल मेरे जेहन में आज सुबह एक पोस्टर देखने के बाद हुई। दिल्ली के त्रिलोकपुरी से शंकर भाटी को बसपा के युवा अध्यक्ष बनाए गए(अंदाजा लगाइए कितनी बड़ी खबर है) पूरा का पूरा इलाका पोस्टरों से भरा है। साथ में बड़े-बड़े बोर्ड और होर्डिग। भाटी जी की तस्वीर सबसे बड़ी होती है और साथ ही छोटी-छोटी तस्वीर मायावती, सतीश मिश्रा और कांशी राम की।

क्या गजब देश है? और क्या गजब के लोग?

क्या आप अजातशत्रु बन पाएंगे?

अगस्त 18, 2007

लोग कहते हैं ना चाहने से क्या नहीं होता है! सब कुछ हो जाता है! क्या सच में सब कुछ हो सकता है? क्या आप जीते जिंदगी अजातशत्रु बन सकते हैं। अजातशत्रु। वो जिसका कोई शत्रु ना हो।

आत्मविश्वास और धैर्य उसकी दो सबसे बड़ी पूंजी है। वह घड़ी के समान है। जो हमेशा चलती रहती है। उसका गुण धीरे-धीरे निखर कर आता है। पांच या दस मिनट में वह किसी को प्रभावित नहीं करता है। और ना ही पांच या दस दिनों में। उसका असली गुण आपके सामने कुछ महीनों में आपको दिखता है।

मेरा एक दोस्त है। उम्र यही कोई 27-28 होगी। वह भी पत्रकार है। जितना मैं उसके बारे में जानता हूं, उसके मुताबिक वह जीते जिंदगी अजातशत्रु बना हुआ है। मेरे जैसे कई दोस्त हैं उसके। यूं कहिए लंबी फेहरिस्त है। लेकिन कोई उसका शत्रु नहीं है। कोई उसका बुरा नहीं चाहता। कोई उससे ईष्र्या नहीं करता। गजब है वो। उसके लिए मैं हमेशा एक बात लोगों को बोलता, बहुत ही सरल है वो।

सिंपली आउटस्टैंडिंग। बहुत आगे जाएगा मेरा यह दोस्त सिद्धार्थ।

स्वतंत्रता आज भी कुछ मांग रही है?

अगस्त 15, 2007

जय हिंद! स्वतंत्रता दिवस पर सभी भारतवासियों को ढेरों मुबारकबाद। यह स्वतंत्रता सबको मिले। हमें बहुत कुछ मिला है। लेकिन क्या यह बहुत कुछ सबों को मिला है?

ढाबे में काम करने वाले बच्चों को सामाजिक स्वतंत्रता। गरीबों और पिछड़ों को काम पाने की स्वतंत्रता। अगर यह नहीं है तो हमारा स्वतंत्र भारत के प्रति इतना भावुक होना बेमानी है। क्या आप इस स्वतंत्रता को पाने के लिए कुछ मदद कर सकते हैं? लोकतंत्र भारत चिल्ला रहा है। चीख-चीख कर चिल्ला रहा है। इसे सुनने के लिए कानों की नहीं आंखों की जरूरत है! क्या आप इसे सुन पा रहे है?

सठियाना किसे कहते हैं, इसे पढ़िये

अगस्त 11, 2007

सच्ची घटना पर आधारित। आप बीती सुना रहा हूं। कोई मजाक ना समझे। यह समझ लें कि जब आप बुढ़ा जाएं तो ऐसा कुछ भी ना करें। नहीं तो कोई आपके बारे में भी कोई कुछ कहेगा या लिख देगा।

मुझे थोड़ी जल्दी थी। दफ्तर से बिना पूछे अपने काम से निकला था। काम पूरा कर फिर दफ्तर भी लौटना था। मुझे जरूरत थी अपने आई कार्ड के फोटो कापी की। दुकान पर गया तो देखा एक बुजुर्ग रौकिंग चेयर पर आराम फरमा रहे थे। हाथ में पका हुआ भुट्टा। यूं कहिए कि बस मजे ले रहे थे। मैंने कहा कि फोटो कापी कराना है। उन्होंने पूछा क्या है? मैंने आई कार्ड दिखाया.. उन्होंने इशारा करते हुए बताया कि आगे दुकान है, वहां से करा लो, मैं नहीं कर पाऊंगा।

मुझे जल्दी तो थी ही, मैंने निवेदन किया। उत्तर में उन्होंने कहा कि आगे चले जाओ वहां हो जाएगा।

मैं आगे चला गया। वहां की फोटो कापी मशीन खराब थी। वापस लौटा। पुन: उसी दुकान पर। मैंने कहा कि मुझे इसकी जरूरत है। प्लीज कर दीजिए। उन्होंने कहा मैं एक-दो कापी नहीं करता हूं। आगे एक और मार्केट है, वहां चले जाओ हो जाएगा। मैंने कहा कि एक नहीं दस कर दीजिए लेकिन कर दीजिए।

बुजुर्ग ने कहा, जब जरूरत एक की है तो दस क्यों? मैंने कहा एक और दस ज्यादा मतलब है कि मुझे जरूरत और जल्दी दोनो है। उसने फिर मुझे कहा कि आगे वाली मार्केट में चला जाऊं। मैंने कहा आप दस के पैसे ले लीजिए।

अब बुजुर्ग कहता है कि एक मैं करता नहीं हूं। दस करूंगा तो कहोगे कि पैसे का भूखा है। मुझे पैसे कमाने का शौक नहीं है। आगे चले जाओ वहां से करा लो।

क्या बुजुर्ग(बुड्ढा) सठिया हुआ नहीं था?

मजेदार चोरी

अगस्त 10, 2007

यह कैसे हो सकता है! यही पूछेंगे ना आप कि चोरी कैसे मजेदार हो सकता है? लेकिन मेरे लिए यह मजेदार ही है। सच में मजेदार..।

मेरे पास एक बाईक है और उसे झाड़ने पोंछने के लिए मैं उसमें एक कपड़ा रखता हूं, जैसे सभी रखते हैं। जब भी मैं किसी पब्लिक पार्किग में गाड़ी खड़ी करता हूं कोई ना कोई मेरे उस गंदे कपड़े को ले उड़ता है। मैं जब गाड़ी के पास जाता हूं तो अपने गाड़ी में रखे कपड़े को ना पाकर बगल की गाड़ी के रखे कपड़े को ले उड़ता हूं।

जब कपड़ा निकालता होता हूं तो डर लगता रहता है कि कहीं गाड़ी का मालिक आकर मुझे ये ना कहे कि क्यों भाई मेरा क्यों निकाल रहे हो। कहीं और से जुगाड़ कर लो।

तो है ना यह मजेदार चोरी।

आईएएस और आईएएस का मक्का मुखर्जी नगर-अंतिम भाग

जुलाई 31, 2007

आज जब मैं इसे लिख रहा हूं तो मुमकिन है कि कई लोगों का दिल बैठा जा रहा होगा। आज आईएएस के प्री का रिजल्ट आने वाला है। दिल बैठने वालों की संख्या ज्यादा होती है। इसके बरक्श जिनकी बल्लियां उछलेंगी उनकी संख्या कम होती है।

1997 में लगभग 13 लाख लोगों ने आईएएस बनने के लिए फार्म भरे थे। वह एक रिकार्ड है। इस साल लगभग एक लाख लोगों ने फार्म भरा था। इस साल से यूपीएसी ने प्री में निगेटिव मार्किग शुरू की है। दर्द देने वाला निर्णय है।

आज की शाम हर रोज की शाम की तरह नहीं होगी। बत्तरा पर भीड़ नहीं के बराबर होगी। जो आज क्वालिफाई करेंगे वो ठेके के बाद सीधे कमरे पर जाएंगे। और जो नहीं क्वालिफाई करेंगे उनके लिए भी कुछ ऐसा ही होगा।

सितंबर और अक्टूबर में त्योहारों का मौसम होता है। इस त्योहारों के मौसम में मेंस देने वाले अपना पसीना बहा रहे होते हैं। यही एक समय होता है जब इनकी दोस्ती दोस्तों से कम किसी ऐसे चीज से ज्यादा होती है जो इन्हें सोने ना दे। सिगरेट, चाय, तंबाकू, गुटखा यह कुछ भी हो सकता है।

मेंस देने वाले हर तीन में से एक को साक्षात्कार के लिए चुना जाता है। साक्षात्कार का समय भी होली के ठीक बाद का होता है। इसका साफ-साफ मतलब है कि साक्षात्कार तक जाने वाले विद्यार्थी त्योहारों का मजा नहीं ले पाते। साक्षात्कार में भी हर तीन में से एक को उस पद के लिए चुना जाता है जिसके लिए वह इतनी मेहनत कर रहा होता है।

चुने जाने के बाद भी कई अफसोस करते होते हैं। मैं आईएएस नहीं बन पाया। ये जोनल पोस्ट आफिस का हेड होना भी कोई नौकरी है। सभी की उम्मीदें आईएएस, आईपीएस, आईएफएस बनने की होती है। लेकिन वो बड़ा मशहूर शेर याद आ रहा है-

बनाने वाले तूने कोई कमी नहीं की
अब किसे क्या मिला, यह तो मुकद्दर की बात है॥

आईएएस और आईएएस का मक्का मुखर्जी नगर-2

जुलाई 30, 2007

शाम का समय। सरकार के एसबीआई बैंक से लेकर के वी कामथ के आईसीआईसीआई बैंक के एटीएम में कतारबद्ध लड़के-लड़कियां। आलू, चावल, दाल के लिए पैसे निकालते हुए।

आज के आईएएस की तैयारी करने वाले छात्र मितव्ययी तो एकदम नहीं होते। सिगरेट और चाय में इनके सबसे ज्यादा पैसे खर्च होते हैं।

दिल्ली आने के बाद इनको जो सबसे ज्यादा दिक्कत होती है वह है एड्रेस प्रूव की। इनका कोई निश्चित ठिकाना तो होता नहीं है। आज यहां हैं तो कल कहीं और। वैसे एड्रेस प्रूव की जरूरत इन्हें दो मौकों पर ज्यादा होती है। सिम कार्ड या फिर बैंक खाता खुलवाने के वक्त। वैसे यह दिक्कत हर शहर में हर नए शख्स को होती है।

इन होनहारों की एक और खास बात होती है यह सफाई खुद से नहीं करते हैं। इन्हें 300 रुपये प्रतिमाह में कूक और 50 रुपये प्रतिमाह में कूड़ा उठाने वाला/वाली बड़े आसानी से मिल जाती है। दिल्ली में सकरुलेशन को लेकर लड़ने वाले दो बड़े अखबार इनकी पसंद नहीं होते। इनके ‘द हिंदू’ आता है। वह अलग की बात है कि उसे भी यह पढ़ते कम ही हैं। प्रतियोगिता दर्पण यहां की हाट मैगजीन है।

अगर इन इलाकों में सबसे ज्यादा कोई परेशान है तो वह हैं मकान मालिक। इनका दर्द कोई नहीं सुनता। कम से कम यह छात्र तो एकदम नहीं। 100 में से 70 मकानों में छात्र की जमघट लगी ही रहती है। आप किसी परिचित छात्र के यहां जाने पर आपका दोस्त कम से कम अपने पांच दोस्तों से आपका परिचय कराता है।

इनकी बातें एक आम जागरूक इंसान के लिए हमेशा मजेदार होतीं हैं। इतिहास के गर्भ से कभी भी आपको ये कोई हीरा तो कभी कोई पत्थर के बारे में बता सकते हैं। हिंदी की बात चलेगी तो बीच-बीच में अज्ञेय, नागाजरुन, प्रेमचंद, दिनकर, महादेवी की पंक्तियां आपको लुभाएंगी। इनके पास बताने को बहुत कुछ होता है। समाज के जोड़-तोड़ के बारे में, इसकी संरचना, जातिगत व्यव्स्था के बारे में समाजशास्त्र वैकल्पिक विषय रखने वाला छात्र आपको बहुत कुछ बता जाएगा।

और भी बहुत कुछ..बाद में